Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

फिर चर्चा में लोकसभा के नेता विपक्ष का मुद्दा

लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा उसी पार्टी को दिया जा सकता है जिसे लोकसभा सीटों में से कम से कम दस फीसदी सीट प्राप्त हुई हो।

फिर चर्चा में लोकसभा के नेता विपक्ष का मुद्दा

सोलहवीं लोकसभा में कोई नेता विपक्ष नहीं है, क्योंकि नियमों के अनुसार जरूरी सांसदों की संख्या किसी विपक्षी पार्टी के पास नहीं है। हालांकि लोकपाल, सीआईसी और सीवीसी की नियुक्ति में नेता विपक्ष की भी भूमिका होती है, इसी को मुद्दा बनाकर कांग्रेस चुनाव नतीजों के बाद बार-बार लोकसभा में नेता विपक्ष के पद की मांग कर रही थी। जिसे लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने पिछले मंगलवार को खारिज कर दिया था। जाहिर है, उन्होंने संवैधानिक नियमों, परंपराओं और एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की सलाह पर यह फैसला लिया। नियमानुसार लोकसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा उसी पार्टी के किसी सदस्य को दिया जा सकता है जिसे कुल लोकसभा सीटों में से कम से कम दस फीसदी सीट प्राप्त हुई हो। लोकसभा में मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से यह संख्या 55 बैठती है। और कांग्रेस, जो भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी है, को सिर्फ 44 सीटें ही मिली हैं। लोकसभा में नेता विपक्ष को कैबिनेट मंत्री के बराबर दर्जा मिलता है। इस प्रकार नेता विपक्ष का सवाल लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसमें मोदी सरकार का कुछ लेना देना नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें लोकपाल के चयन में हो रही देरी पर सवाल उठाया है। याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्टने केंद्र सरकार से पूछा है कि लोकपाल की नियुक्ति के विषय में विपक्ष के नेता के प्रावधान जैसे शब्द को वह किस रूप में लेती है। सुप्रीम कोर्ट ने जवाब देने के लिए चार हफ्ते का समय निर्धारित किया है। जाहिर है,सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखेगी। भ्रष्टाचार की रोकथाम के उद्देश्य से पिछले वर्ष दिसंबर में लोकपाल कानून बना था। इस कानून के अनुसार लोकपाल के सदस्यों की नियुक्ति पांच सदस्यों की एक पैनल द्वारा की जाएगी। प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के अलावा लोकसभा में नेता विपक्ष भी इस पैनल का हिस्सा होगा। कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि विपक्ष का नेता नहीं होना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, परंतु देखा जाए तो इसमें खतरे जैसी कोई बात नहीं है। इससे पहले भी कांग्रेस की सरकारों में कई बार विपक्ष का नेता नहीं रहा है। 1980 और 1984 में ऐसी परिस्थिति आ चुकी है, तब भी लोकतंत्र फलता-फूलता रहा है। वहीं यदि सदन में विपक्ष का कोई नेता नहीं है तो भी इन पदों पर नियुक्तियां हो सकती हैं। कई कानूनों में नेता विपक्ष या लोकसभा में विपक्ष में सबसे बड़े दल का नेता का प्रावधान किया गया है। इस पैनल में भी लोकसभा में विपक्ष के सबसे बड़े दल का नेता शामिल हो सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस सवाल के बाद कांग्रेस को एक बार फिर कुछ हासिल होता दिख रहा है। यही वजह है कि वह इसे बेवजह तूल दे रही है। इससे पहले भी कांग्रेस बजट सत्र के दौरान सरकार को घेरती रही और उसके नेता सदन में लोकसभा अध्यक्ष पर कई बार व्यक्तिगत टिप्पणी करते देखे गए। यही नहीं वह इस मुद्दे को लेकर कोर्ट में चली गई जहां उसे सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। जब यह परंपरा उसी की बनाई हुई है अर्थात अपने जमाने में किसी को यह पद नहीं दिया तो अब वह यह पद क्यों मांग रही है। और इसे प्रतिष्ठा का सवाल क्यों बना रही है।

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि और हमें फॉलो करें ट्विटर पर-

Next Story
Top