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सर्वेक्षण पर रोक की चुनाव आयोग से उम्मीद बेमानी

चुनाव आयोग का कहना है कि सर्वेक्षण पर रोक लगाने के लिए उसके द्वारा अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल विधि सम्मत नहीं होगा।

सर्वेक्षण पर रोक की चुनाव आयोग से उम्मीद बेमानी
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नई दिल्ली. ओपनियन पोल को प्रतिबंधित करने के सवाल पर चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट पर सकारात्मक संदेश दिया है। चुनावों के दौरान ओपिनियन पोल के प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगाई जानी चाहिए या नहीं इस पर पिछले कई महीनों से बहस जारी है। केंद्र सरकार का कहना था कि चुनाव आयोग संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल कर इसे प्रतिबंधित कर सकती है।
वहीं अब चुनाव आयोग ने प्रति उत्तर में कहा है कि बेहतर होगा यदि सरकार कानून बनाकर इसे प्रतिबंधित करे, जैसे कि एग्जिट पोल के संबंध में किया गया है। केंद्र सरकार पिछले दिनों इस मुद्दे से दूर भागती रही, उसे शायद इसकी जरूरत भी महसूस नहीं हो रही थी। वहीं जब चुनाव नजदीक आने लगे तब वह क्यों उम्मीद कर रही थी कि चुनाव आयोग उसकी जिम्मेदारियों का निर्वहन करेगा। वैसे भी चुनाव आयोग का कहना है कि सर्वेक्षण पर रोक लगाने के लिए उसके द्वारा अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल विधि सम्मत नहीं होगा। क्योंकि मौजूदा कानून के तहत आयोग के पास मतदान से 48 घंटे पहले सर्वेक्षण को प्रतिबंधित करने का अधिकार है।
दरअसल, ओपिनियन पोल को लेकर मामला गत वर्ष पांच राज्यों में चुनाव से पूर्व जोर पकड़ा, जब चुनाव आयोग ने सभी दलों के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि चुनाव से पूर्व ओपिनियन पोल के प्रकाशन और प्रसारण पर रोक लगानी चाहिए। इसके लिए उनसे राय भी मांगी थी। तब कांग्रेस ने इसका सर्मथन किया था और भाजपासहित दूसरे दलों ने विरोध। कांग्रेस की ओर से तर्क दिया गया था कि ओपिनियन पोल की प्रक्रिया न तो वैज्ञानिक है और न ही पारदर्शी।
ऐसे में इससे लोगों को गुमराह भी किया जाता है। हालांकि यह एक तरह से सच भी है कि ओपिनियन पोल में सभी मतदाताओं की राय नहीं ली जाती है, लेकिन इसके आधार पर कईबार सही रुझान भी मिलते रहे हैं। सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने का यह बहुत अच्छा तरीका माना जाता रहा है। हालांकि इसके साथ एक समस्या यह भी है कि ओपिनियन पोल कईबार प्रायोजित भी होते हैं। कोई भी पैसे देकर अपने पक्ष में सर्वेक्षण करा सकता है।
इस शंका से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ पार्टियां अपने हित साधने के लिए टीवी चैनलों की ओर से प्रायोजित सर्वेक्षण करा सकती हैं। इस तरह का खेल होता भी रहा है। यही नहीं अलग-अलग सर्वे में अलग-अलग आंकड़े आते हैं जिससे आम लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है और जनता गुमराह होती है। यह आरोप लगते हैं कि ओपिनियन पोल के जरिए नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश होती है। हालांकि ऐसे आरोपों में उतना दम नहीं होता है। क्योंकि देश ही नहीं विदेशों में भी कई बार ओपिनियन पोल के नतीजे झूठे साबित हुए हैं।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां के संविधान ने लोगों को कुछ लोकतांत्रिक अधिकार दिए हैं। ऐसे में ओपिनियन पोल के जरिए लोगों का रुझान जानने की एक कोशिश को भविष्य में प्रतिबंधित करने से पहले इसका खयाल रखना होगा कि जनता के अधिकारों का कहीं दमन तो नहीं हो रहा है। सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर इस मसले को देखना चाहिए।
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