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चिंतनः ओबामा की नसीहत पर गौर करने की जरूरत

पेरिस में बर्बर आत्मघाती हिंसक हमले के बाद दुनिया आईएस के आतंक से सहमी हुई है।

चिंतनः ओबामा की नसीहत पर गौर करने की जरूरत
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पेरिस में बर्बर आत्मघाती हिंसक हमले के बाद दुनिया आईएस के आतंक से सहमी हुई है। यूं तो इस घटना की संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून समेत पूरी दुनिया ने कड़े शब्दों में निंदा की है, लेकिन इसी के साथ इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंक, इस्लाम व आतंकवाद के बीच संबंध और मुस्लिम समुदाय की विश्वसनीयता व अन्य समुदाय के बीच स्वीकार्यता पर बहस भी शुरू हो गई है।
बहस की शुरूआत अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के उस बयान से हुई है जिसमें उन्होंने समूचे मुस्लिम समुदाय से अपील की कि उन्हें अपने बच्चों की परवरिश और तालीम पर ध्यान देना चाहिए और उनकी निगरानी करनी चाहिए कि वे कहां जाते हैं, किनसे मिलते हैं और क्या करते हैं।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ओबामा के इस बयान की आलोचना हो रही है कि वे अपने इस कथन के जरिये आतंकवाद के कारणों का पूरा बोझ मुस्लिम समुदाय और इस्लाम पर डाल देना चाहते हैं, जबकि आतंकवाद के पनपने के जिम्मेदार शक्तिशाली देशों (यूरोपीय-अमेरिकी) में कच्चे तेल की सुलभ प्राप्ति, अपने हथियारों की खपत और वर्ल्ड में सुपर पावर बनने की चाहत हैं, लेकिन ओबामा के इस बयान के अर्थ को गहराई में देखा जाय तो समसामयिक लगता है।
आज इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, तालिबान, तहरीके तालिबान (पाक), बोको हरम, लश्करे तैयबा जैसे सभी आतंकी गुटों को देखें, सभी मध्य व दक्षिण एशिया व अफ्रीका के मुस्लिम बहुल व शासित देशों में ऑपरेट कर रहे हैं और इनमें सभी मुसलमान ही काम कर रहे हैं। इसलिए ओबामा का इशारा मुस्लिम समुदाय की परवरिश की ओर है, तो उसके गहरे अर्थ को समझना चाहिए। हम किसी भी समुदाय के हों, लेकिन हर परिवार के अभिभावकों को दायित्व है कि वे अपने बच्चों की हर गतिविधियों पर नजर रखें।
आज ओबामा के बयान को जिस तरह इस्लाम से जोड़कर व्याख्या की जा रही है, वह सही नहीं है। सच तो यह है कि इस्लाम कहीं से भी किसी भी प्रकार की हिंसा की वकालत नहीं करता है। धर्म के नाम पर इस्लाम मुकम्मल है, यह भी अमन और भाईचारे का पैगाम देता है। ऐसा नहीं होता तो, आज सबसे बड़ा मुस्लिम देश इंडोनेशिया शांत देश नहीं होता, फ्रांस में यूरोप की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी नहीं रह रही होती।
कई उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि इस्लाम धर्म हिंसा को बढ़ावा नहीं देता। लेकिन उसी के साथ यह भी चिंता पैदा करने वाला तथ्य है कि सभी आतंकी गुटों में कट्टर मुस्लिम ही सक्रिय हैं। क्यों हैं, यह पड़ताल का विषय है और मुस्लिम समाज को, मौलवियों-बुद्धिजीवियों-संगठनों को इस पर गहनता से विचार करना चाहिए, चिंतन करना चाहिए। उन्हें किसी भी आतंकी घटना का मुखर विरोध करना चाहिए।
ओबामा भी यही कह रहे हैं कि आतंकवाद का, कट्टरता का जितना मुखर विरोध मुस्लिम समुदाय की ओर से होना चाहिए, उतना नहीं हो रहा है, इसका नतीजा है कि दुनिया में इस्लाम की कट्टर छवि बन रही है। आतंकवाद के चलते ही दुनिया की दूसरी बड़ी आबादी होने के बावजूद मुस्लिम की विश्वसनीयता मलिन हुई है, दूसरे समुदाय के बीच साख गिर रही है। जिस तरह भारत के मुस्लिम विद्धानों व संगठनों ने आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता दिखाई है, वैसे ही ग्लोबल स्तर पर भी मुस्लिम समुदायों को आतंकवाद व कट्टरता के खिलाफ मुखर होना चाहिए।
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