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चिंतन: एनएसजी के लिए स्विस सर्मथन बड़ी उपलब्धि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा का मकसद एनएसजी के लिए स्विटजरलैंड और मेक्सिको का सर्मथन जुटाना है।

चिंतन: एनएसजी के लिए स्विस सर्मथन बड़ी उपलब्धि
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भारत के लिए एनएसजी पर स्विट्जरलैंड का सर्मथन बड़ी सफलता है। दरअसल, हमें अपने असैन्य परमाणु कार्यक्रम खासकर एटमी बिजली प्रोजेक्टों के लिए यूरेनियम की जरूरत है। इसकी आपूर्ति सदा बनी रहे, इसके लिए भारत का न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में शामिल होना जरूरी है। अभी एनएसजी में 48 सदस्य हैं। स्विट्जरलैंड और मेक्सिको भी इसके सदस्य हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस यात्रा का मकसद एनएसजी के लिए स्विटजरलैंड और मेक्सिको का सर्मथन जुटाना है। स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति जोहन शेंडर अम्मान ने कहा कि हमारा वादा है कि हम एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत का सर्मथन करते हैं। एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत 12 मई को ही आवेदन दे चुका है। इससे पहले पाकिस्तान ने चीन की मदद से अड़ंगा लगा दिया था। एनएसजी में मेंबरशिप मिलने के साथ ही भारत के लिए दूसरे देशों के साथ कारोबार के रास्ते खुल जाएंगे। हम खुद भी असैन्य परमाणु तकनीक दूसरे देशों को बेच सकेंगे।
भारत का अमेरिका के साथ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु करार पूर्व पीएम डा. मनमोहन सिंह और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के समय वर्ष 2005 में हुआ था। इसके बाद भारत ने ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और कनाडा के साथ भी असैन्य परमाणु करार किया है, लेकिन एनएसजी का सदस्य नहीं होने से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति नहीं हो पा रही है। अब पीएम मोदी की कोशिश जल्द से जल्द एनएसजी सदस्यता पाने की है। इसकी वजह है कि एनएसजी की वियना में इसी नौ जून को और सोल में 24 जून को बैठक होगी, जिसमें भारत के आवेदन पर विचार किया जाएगा।
अधिक से अधिक सदस्य देशों का सर्मथन भारत को सदस्यता पाने के लिए जरूरी है। फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका पहले से ही अपना सर्मथन दे चुके हैं। उम्मीद है कि अमेरिका के बाद जब पीएम मेक्सिको जाएंगे, तो वहां से भी भारत को सर्मथन मिलेगा। खुद अमेरिका भी भारत को एनएसजी में लाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का नरेंद्र मोदी के साथ बॉन्डिंग भी बेहतर अवसर है। एनएसजी में भारत का आना अमेरिकी हित में भी है।
दोनों के बीच हुए परमाणु करार मूर्तरूप ले सकेगा। स्विस यात्रा के दौरान दूसरी अहम चीज यह हुई है कि पीएम मोदी ने स्विट्जरलैंड के साथ ब्लैकमनी, टेक्नोलॉजी, इन्वेस्टमेंट, ट्रेड और टैक्स चोरी संबंधी सूचनाओं के साझा करने पर भी बात की है। कथित तौर पर भारत के अरबों डालर स्विस बैंकों में ब्लैकमनी के रूप में जमा है। स्विट्जरलैंड का टैक्स नियमों के उल्लंघन की सूचना साझा करने के लिए ऑटोमैटिक एक्सचेंज ऑफ इन्फॉर्मेशन को लेकर कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, साउथ कोरिया और यूरोपीय यूनियन के साथ समझौता है।
मोदी भी इसी तरह का करार स्विस सरकार के साथ चाहते हैं। स्विटजरलैंड ने ब्लैकमनी पर सूचना साझा करने में मदद का वादा किया है। भारतीय टेक्नोलॉजी को मॉडर्नाइज करने और बड़े कैपिटल इन्वेस्टमेंट के लिए खाका तैयार हो सकता है। स्विट्जरलैंड भारत में निवेश के मामले में 10 बड़े देशों में शामिल है। स्विस का 30,760 करोड़ रुपये का निवेश भारत में है। देश में 250 स्विस कंपनियां काम कर रही हैं। अब देखना यह है कि पीएम की इस स्विस यात्रा से स्विटजरलैंड भारत की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है।
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