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तम्बाकू के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत

यह स्थिति तब है जब दुनिया में हाइपरटेंशन के बाद सबसे ज्यादा मौत की वजह तम्बाकू है।

तम्बाकू के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने की जरूरत
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अकसर कहा करते थे, ‘मैं अब तक यह समझ नहीं पाया हूं कि लोगों को तम्बाकू का इतना जबरदस्त शौक क्यों है, जबकि यह हर तरह से नुकसानदेह होता है। यह हमारे धन को ही नष्ट नहीं करता, वरन स्वास्थ और परलोक को भी बिगाड़ देता है।’ तम्बाकू सेवन करने वालों में देश का हर तबका शामिल है। देखा जाए तो यह लोगों के जीवन में इस कदर घुलमिल गया हैकि सरकार द्वारा विभिन्न प्रयासों के बावजूद उससे पीछा छुड़ाना कठिन हो रहा है।
यह स्थिति तब है जब दुनिया में हाइपरटेंशन के बाद सबसे ज्यादा मौत की वजह तम्बाकू है। इसकी वजह से होने वाली सांस संबंधी रोग, टीबी, हृदय रोग और कैंसर जैसी गंभीर और खतरनाक व्याधियों के कारण विश्व में प्रति वर्ष साठ लाख लोगों की असमय मृत्यु हो जाती है। इसके अतिरिक्त तम्बाकू सेवन करने वालों के संपर्क में आने से भी प्रति वर्ष छह लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। देश-दुनिया के लोगों को हर वर्ष 31 मई को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा विश्व तम्बाकू निषेध दिवस मनाकर जागरूक किया जाता है।
इस दिन इससे जुड़े खतरों के प्रति लोगों को आगाह किया जाता है और इसके सेवन पर अंकुश लगाने के लिए जन जागरूकता फैलाई जाती है। इसकी शुरुआत 1987 से हुई थी। इस वर्ष इसके लिए थीम चुनी गई है- तंबाकू पर टैक्स बढ़ाएं। देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इसका सर्मथन किया है। उनका कहना हैकि इस तरह के कदम से तम्बाकू के सेवन के प्रति लोगों को हतोत्साहित किया जा सकता है।
बृहस्पतिवार को पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी इकोनॉमिक बर्डेन ऑफ टूबैको रिलेटेड डिजीज इन इंडिया नामक रिपोर्ट में कहा गया हैकि यदि टैक्स बढ़ाने से तम्बाकू उत्पादों की कीमतों में दस फीसदी की वृद्धि होती है, तो उसके सेवन में करीब 4-5 फीसदी की गिरावट आएगी। समाज का एक वर्ग वर्षों कह रहा हैकि जब सरकारें इसके खतरों को जानती हैं तब देश भर में इसके उत्पादन और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती हैं? हालांकि कुछ लोगों का आरोप है कि इससे होने वाले भारी राजस्व के चलते इस तरह के कदम उठाने से सरकारें बचती हैं।
कुछ राज्यों में इसके वितरण पर प्रतिबंध जरूर है पर वहां भी इसकी खुलेआम ब्रिकी देखी जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि सरकार को इससे जितना राजस्व मिलता है उससे ज्यादा इसके चलते पैदा होने वाली बीमारियों के इलाज और नियंत्रण के उपायों पर खर्च हो जाता है। तम्बाकू लोगों की सेहत के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी किस तरह नुकसानदेह साबित हो रहा है इसकी भी एक बानगी देखिए कि वर्ष 2011 में 35-69 आयु वर्ग के लोगों में तम्बाकू जनित बीमारियों के कारण देश को करीब एक लाख करोड़ का बोझ उठाना पड़ा। यह राशि भारत की जीडीपी के करीब 1.16 फीसदी के बराबर बैठती है।
रिपोर्ट में कहा गया हैकि तम्बाकू के सेवन के कारण पैदा हुई बीमारियों के इलाज पर ही अकेले 2011 में करीब 1.04 लाख करोड़ की लागत आई। कुल मिलाकर हर दसवें वयस्क की मृत्यु के लिए जिम्मेदार तम्बाकू का सेवन पूरी तरह तभी रुकेगा जब समाज में इसके लिए माहौल बनाया जाए। इसलिए जरूरी है कि इसके सेवन के खिलाफ हर स्तर पर लगातार प्रचार होता रहे, मुहिम चलती रहे।
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