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चिंतनः राजनीतिक अंतर्विरोधों के बीच नीतीश की नई पारी

मुख्यमंत्री के रूप में पांचवीं बार नीतीश कुमार की ताजपोशी का समारोह कई मायनों में राजनीति का नया पहाड़ा गढ़ा है।

चिंतनः राजनीतिक अंतर्विरोधों के बीच नीतीश की नई पारी
बिहार में मुख्यमंत्री के रूप में पांचवीं बार नीतीश कुमार की ताजपोशी का समारोह कई मायनों में राजनीति का नया पहाड़ा गढ़ा है। इसमें सियासत का बिल्कुल नया चेहरा देखने को मिला है। यह चेहरा कितनी दूर तक दिखेगा और देश की सियासत को किस ओर ले जाएगा, यह महत्वपूर्ण सवाल है। इस नए चेहरे का नायक नीतीश कुमार हैं, जिनकी सत्ता लालसा का उत्कट रूप इस बार मुखर होकर सामने आया है।
विचारधारा के रूप में समाजवादी राजनीति की तिलांजलि, जयप्रकाश नारायण व लोहिया-कपरूरी ठाकुर के गैरकांग्रेसवाद के सपने का उन्हीं के उत्तराधिकारियों द्वारा अंत, अस्मिता का हुंकार भरने वाले का अस्मिता के भंजक से मिलन और भ्रष्टाचार विरोध के नैतिक ठेकेदार की भ्रष्टाचार के दोषी से गलबहियां, ये सब चीजें इसमें देखने को मिली हैं। यह पूरा समारोह ही सियासी ड्रामा और थ्रिल से भरा हुआ प्रतीत हुआ।
नीतीश की बात करें, तो वे जेपी आंदोलन व कर्पूरी ठाकुर के समय से ही गैरकांग्रेसवाद व समाजवाद की राजनीति लालू के साथ कर रहे थे। दोनों खुद को जेपी-लोहिया-कपरूरी के वारिस कहते नहीं थकते थे। लेकिन जब उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने जोर मारी तो लालू को सत्ता से हटाने के लिए भाजपा से हाथ मिलाया और सवर्ण वोट का दोहन किया और अब फिर उसी लालू के गोद में जा बैठे, जिनका उन्होंने कभी जंगलराज व भ्रष्टाचार के नाम पर विरोध किया था। इस बार हालांकि उनकी नई पारी आसान नहीं रहने वाली है। उन पर दोहरा बोझ होगा। एक तो उन्हें चुनाव के दौरान किए गए विकास के वादे पूरे करने होंगे। नीतीश ने पीएम नरेंद्र मोदी के बिहार के लिए सवा लाख करोड़ के पैकेज के जवाब में दो लाख करोड़ के विकास एजेंडे का ऐलान किया था। अब इसे करने होंगे। दूसरा वे इस बार आसानी से काम कर पाएंगे, इस पर संशय है। क्योंकि चूंकि भाजपा की राजनीति विकास की रही है, इसलिए नीतीश को काम करने में दिक्कत नहीं हुई थी, लेकिन 15 साल के शासन में लोगों ने लालू का जो रूप देखा है, जिसमें भाई-भतीजावाद, जातिवाद व अपराध का बोलबाला रहा था और बिहार जंगलराज का पर्याय बन गया था तो उस लालू के साथ नीतीश के ज्यादा मजबूर सीएम साबित होने की आशंका है।
नीतीश पर लालू का दबाव शपथग्रहण से ही दिखने लगा है। उन्हें लालू के दोनों बेटों को मंत्री बनाना पड़ा है और बिना अनुभव नंबर दो पर रखना पड़ा है। मंत्रिमंडल में भी नीतीश सवर्णों को उचित भागीदारी नहीं दे पाए। इस समारोह में सबसे अधिक कांग्रेसी सीएम व नेता पहुंचे थे। भ्रष्टाचार के चलते ही कांग्रेस को केंद्र से सत्ता गंवानी पड़ी थी। अब कांग्रेस व लालू के साथ नीतीश के सरकार बनाने के बाद उन्हें अपनी छवि फिर से परिभाषित करनी होगी।
समारोह में शिवसेना के दो नेता पहुंचे थे, यह वही शिवसेना है, जो मुंबई में बिहारियों को दुत्कारती रही है और बिहारी अस्मिता के नाम पर नीतीश शिवसेना से टकराते रहे हैं। देश ने राजनीति का सबसे विद्रूप चेहरा तब देखा, जब ‘ईमानदार’ सीएम अरविंद केजरीवाल और चारा घोटाला में दोषी जेल की हवा खा चुके लालू प्रसाद यादव से गर्मजोशी से गले मिले। इस मंच पर देश ने देखा कि नेताओं की कथनी व करनी में कितना फर्क है। वे जनता के सामने कहते क्या हैं और सत्ता में आ जाने के बाद करते क्या हैं। अब देखने वाली बात होगी कि भाजपा विरोध के नाम पर इकट्ठा होने वाले नेता व दल देश की राजनीति और विकास को किस दिशा में ले जाते हैं।
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