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बड़े बदलाव का वाहक बनेगा नीति आयोग, देश में होगा तेजी से आर्थिक विकास

सरकार किसी खास तबके या क्षेत्र के लिए नीति बनाने में उनकी विशेषज्ञता का उपयोग करना चाहती है।

बड़े बदलाव का वाहक बनेगा नीति आयोग, देश में होगा तेजी से आर्थिक विकास
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योजना आयोग के स्थान पर बने नेशनल इंस्टीट्यूशन ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया यानी नीति आयोग की शनिवार को हुई पहली बैठक के बाद उम्मीद हैकि लोगों में इसके उद्देश्यों को लेकर बचा खुचा भ्रम भी दूर हो गया होगा। बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा है कि नीति आयोग न सिर्फ सहकारी-संघवाद की धारणा को मजबूत करेगा, बल्कि राज्यों में विकास को लेकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का वाहक भी बनेगा। इस आयोग की स्थापना का एक उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों को सरकार में किसी न किसी रूप में जगह देना भी है। सरकार किसी खास तबके या क्षेत्र के लिए नीति बनाने में उनकी विशेषज्ञता का उपयोग करना चाहती है।

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भारत में जिस तरह के हालात हैं। यहां जिस तरह से गरीबी, पिछड़ापन और संसाधनों का अभाव है, उसे दूर करने के लिए तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास की सख्त दरकार है। लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक तरफ जहां तेज आर्थिक विकास चाहिए तो वहीं दूसरी तरफ तर्कपूर्ण कर व्यवस्था, सहज राजकोषीय नीति और ढांचागत विकास की जरूरत है। आज ग्लोबलाइजेशन के दौर में देश के सामने अलग तरह की चुनौतियां आ रही हैं। देश में आतंरिक चुनौतियां तो बरकरार हैं ही। जाहिर है, आज आर्थिक उदारीकरण के दौर में कई सारे मानक बदल गए हैं। इन मानकों पर 65 साल पुराना योजना आयोग खरा नहीं उतर रहा था। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से इसे भंग करने और इसकी जगह कहीं अधिक समायोजक संस्था बनाने का ऐलान किया था।

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हालांकि मार्च, 1950 में गठित योजना आयोग ने शुरुआती कुछ दशकों में निश्चय ही आधारभूत संरचना और आर्थिक विकास के मद्देनजर बेहतर काम किया था पर बाद के दिनों वह अपनी प्रासंगिकता खोने लगा था। खासकर 1991 में नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद योजना आयोग पर सवाल उठने लगे थे। संभवत: इसकी बड़ी वजह यह भी रही कि योजना आयोग राज्यों पर एक समानांतर केंद्रीय सत्ता की तरह नियंत्रण कर रहा था और उनकी नीतियों और योजनाओं को प्रभावित कर रहा था।

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भारत के संघीय ढांचे में राज्यों की प्रमुख भूमिका होती है, मगर हालत यह थी कि निर्वाचित मुख्यमंत्रियों तक को अपने राज्यों के हितों के लिए योजना आयोग के समक्ष याचक बनना पड़ता था। उसकी बैठकों में केंद्र और राज्य के बीच के आपसी टकराव देखने को मिलते थे। गरीबी की उसकी परिभाषा से यह भी पता चला कि योजना आयोग जमीनी सच्चाई से कितना दूर हो गया था। अब नीति आयोग में इन खामियों को दूर किया गया है। इसका दायरा काफी व्यापक बनाया गया है, और उसमें मुख्यमंत्रियों को भी शामिल किया है। यह सरकार के थिंक टैंक संस्था की तरह काम कर रहा है। केंद्र व राज्य के स्तर पर सरकारों को रणनीतिक और तकनीकी सलाह दे रहा है तथा उनकी नीति निर्धारण में मदद कर रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह आयोग हर व्यक्ति तक विकास का लाभ सुनिश्चित करते हुए भारत के समग्र विकास को सुनिश्चित करने में सफल रहेगा।

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