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चिंतन: बिना कानून बदले किशोर को सख्त सजा नहीं

निर्भया को जिन छह लोगों ने अपनी हवस का शिकार बनाया था, उनमें से एक नाबालिग भी था।

चिंतन: बिना कानून बदले किशोर को सख्त सजा नहीं
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हाल ही में निर्भया कांड के तीन साल पूरे होने पर समूचे देश ने उसे श्रद्धांजलि दी। साथ ही बलात्कार जैसी बर्बर घटनाओं के खिलाफ हमारी लड़ाई कितनी आगे बढ़ी है? इस पर भी अलग- अलग मंचों पर चर्चा हुई। हालांकि हालात अभी भी नहीं बदले हैं। रह-रह कर देश के किसी भाग से दुष्कर्म की ऐसी खबरें आती रहती हैं जिससे समाज का सिर शर्म से झुक जाता है।
16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में निर्भया कांड के विरोध में पूरा देश उठ खड़ा हुआ था। ऐसे अपराधियों पर सख्त लगाम लगाने के लिए संसद से सड़क तक एक सुर में मांग हुई थी जिसके बाद आपराधिक कानून में बदलाव किए गए जिसमें बलात्कार करने वाले को मौत की सजा का प्रावधान किया गया।
उम्मीद की गई थी कि कानून का डर अपराधियों में बैठेगा और महिलाओं की सुरक्षा से खिलवाड़ करने के पहले वे सौ बार सोचेंगे, लेकिन विडंबना है कि आज भी यह एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
दरअसल, हमने कानून तो बना लिए, लेकिन समाज और परिवार अपने स्तर पर बदलाव नहीं ला पा रहे हैं। जब तक ये दोनों अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह ठीक ढंग से नहीं कर पाएंगे, सिर्फ कानून इस समस्या का हल नहीं कर पाएगा।
निर्भया को जिन छह लोगों ने अपनी हवस का शिकार बनाया था, उनमें से एक नाबालिग (किशोर) भी था। निर्भया से सबसे ज्यादा बर्बरता इसी ने दिखाई थी। वहीं एक ने सुनवाई के दौरान ही आत्महत्या कर ली थी। बाद में निचली अदालत ने नाबालिग को छोड़कर बाकी चारों को मौत की सजा दी, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। अभी मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
वहीं नाबालिग को तीन साल के लिए बाल सुधार गृह में भेजा गया। दरअसल, 18 साल से कम उम्र के किसी व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा नहीं चल सकता, उसे बाल सुधार गृह में ही रखा जा सकता है। वहां उसके तीन साल पूरे हो गए हैं। अब उसके रिहा होने का समय आ गया है। हालांकि उसके अपराध की गंभीरता और जेहाद की ओर उसके झुकाव की खुफिया रिपोर्ट के बाद भाजपा नेता सुब्रह्ण्यम स्वामी ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इसे अभी वहीं रखने की मांग की थी।
निर्भया के मां-बाप, केंद्र सरकार और तमाम गैरसरकारी संगठनों ने भी ऐसी ही इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी मांगों को खारिज कर दिया है जिससे उसके बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है।
दरअसल, इस मामले में अदालत के पास भी कोईदूसरा चारा नहीं है। कानूनन उसके हाथ बंधे हैं। वह मौजूदा कानून के अनुसार ही कोई फैसला सुना सकती है, उससे बाहर जाकर कोई आदेश नहीं दे सकती। संविधान के अनुसार एक अपराधी को उसके अपराध के लिए वही सजा दी जा सकती है जिसका प्रावधान उस समय के कानून में है।
अपराध की तिथि के बाद का कानून उस पर प्रभावी नहीं होगा। जाहिर है, जब तक मौजूदा कानून नहीं बदल जाता तब तक अदालतें भी कुछ नहीं कर पाएंगी। हालांकि गंभीर अपराधों में नाबालिग की उम्र 18 वर्ष से कम कर 16 करने संबंधी विधेयक संसद में लंबित है, जब वह कानून का रूप ले लेगा, उसके बाद से ही ऐसे दोषियों को कड़ी सजा दी जा सकेगी।
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