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नेताजी की मौत का सच सामने आने की उम्मीद

नेताजी के गुम होने का रहस्य जानने के लिए बाद की सरकारों ने अपने स्तर पर अलग अलग आयोग बनाए

नेताजी की मौत का सच सामने आने की उम्मीद

नई दिल्ली. केंद्र सरकार का नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत समेत अन्य पहलुओं से जुड़ी गोपनीय फाइलें सार्वजनिक करने का फैसला स्वागतयोग्य है। अगले वर्ष नेताजी की जयंती के दिन 23 जनवरी से ये फाइलें खुलनी शुरू हो जाएंगी। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी के परिवार के सदस्यों से कहा है कि वह रूस और ब्रिटेन की सरकारों से भी गुजारिश करेंगे कि वे संबंधित फाइलें सार्वजनिक करें। गत महीने पश्चिम बंगाल की सरकार ने उनसे संबंधित 64 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक किया था, उसके बाद से केंद्र सरकार से भी मांग की जाने लगी थी कि वह भी इन पर से परदा हटाए ताकि सच सामने आ सके।

दरअसल, नेताजी का अंतिम दिनों में क्या हुआ? वे किन हालातों में गुम हुए? यह अब भी रहस्य है। इनकी सच्चाई उजागर करने की मांग सिर्फ नेताजी के परिजन ही नहीं बल्कि पूरा देश करता रहा है, लेकिन पूर्व की सरकारें यह दलील देती रहीं कि उनके लापता होने से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने से भारत के कुछ देशों से संबंध खराब हो सकते हैं। हालांकि ऐसे तकरें में कोई दम नहीं होता है, क्योंकि एक निश्चित समय के बाद गोपनीय सूचनाओं को जनता के सामने लाने का चलन अधिकांश देशों में पहले से मौजूद है। ऐसा माना जाता है कि तीस या चालीस साल बाद यदि किसी सच से परदा उठे भी तो उसका कोई ज्यादा प्रभाव पैदा नहीं होता है। ऐसे में नेताजी से जुड़ी दशकों पुरानी फाइलों को गोपनीयता के आवरण में छिपाए रखने का आज कोई औचित्य नहीं है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि इतिहास को दबाने की जरूरत नहीं है, बल्कि हमें उसका सामना करना चाहिए।

नेताजी के गुम होने का रहस्य जानने के लिए बाद की सरकारों ने अपने स्तर पर अलग अलग आयोग बनाए, लेकिन वे भी किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सके। 1956 में गठित शाह नवाज आयोग और 1970 में बनी खोसला आयोग ने विमान दुर्घटना को सही माना। 1999 में बने मुखर्जी आयोग ने इसे खारिज कर दिया। जाहिए है, ये देश को अंधेरे में रखने वाले ही साबित हुए। पिछले महीने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जो फाइलें उजागर की थीं, उनसे कुछ बातें सामने आई हैं, जैसे कि नेताजी की मौत 1945 में ताइवान में विमान दुर्घटना ने नहीं हुई थी। आजादी के बहुत वर्षों बाद नेताजी के रिश्तेदारों की तत्कालीन सरकार ने जासूसी कराई थी। शायद तब पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी यह विश्वास नहीं था कि उनकी वाकई में मौत हो गई है। हालांकि फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि केंद्र सरकार के पास जो फाइलें हैं उनसे क्या कुछ नया सामने आएगा।

बहरहाल, कुछ लोग यह जरूर मान रहे हैं कि इनसे तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों का जवाब मिल सकता है। 1945 में ताइवान में विमान हादसे में नेताजी की मौत हुई थी या नहीं? रेनकोजी मंदिर में रखी गई अस्थियां नेताजी की हैं या नहीं? क्या फैजाबाद में गुमनामी बाबा बनकर रहने वाले व्यक्ति नेताजी थे? हालांकि इन फाइलों से जो भी सच्चाई सामने आए, एक बात साफ है कि इनके सामने आने के बाद नेताजी से जुड़ी अटकलों पर एक हद तक विराम लग जाएगा।

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