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चिंतन: भूकंप के सामने मनुष्य कब तक रहेगा असहाय

हम प्राकृतिक आपदाओं को रोक नहीं सकते हैं, लेकिन उनसे बचाव के लिए जरूरी तैयारी कर सकते हैं।

चिंतन: भूकंप के सामने मनुष्य कब तक रहेगा असहाय
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प्रकृति के सामने मनुष्य किस कदर असहाय है, शनिवार को आए भयानक भूकंप ने एक बार फिर साबित कर दिया है। भूकंप का केंद्र नेपाल की राजधानी काठमांडू और उसके दूसरे प्रमुख शहर पोखरा के बीच था जिसके झटके उत्तर भारत के बडेÞ भूभाग सहित तिब्बत, चीन और बांग्लादेश तक महसूस किए गए। नेपाल में आठ दशक बाद इतना शक्तिशाली भूकंप आया है। न सिर्फइसकी तीव्रता ज्यादा रही, बल्कि इसकी अवधि भी अधिक थी। इसी वजह से नेपाल में जन-धन की हानि भी सबसे अधिक है। अब तक दो हजार से भी ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। हजारों मकान ध्वस्त हो गए हैं। कई ऐतिहासिक धरोहरों का नामलेवा नहीं बचा है। वहीं अभी भी सैकड़ों लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है।
देश में भी बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। यहां भी सत्तर से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। चूंकि दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से इतर मनुष्य के लिए भूकंप का अनुमान लगाना अभी भी असंभव कार्य बना हुआ है इसीलिए जब भी वह आता है जन-धन की हानि व्यापक पैमाने पर होती है। तमाम कोशिशों के बाद वैज्ञानिक अभी तक सिर्फ यही जान पाए हैं कि किन-किन इलाकों में भूकंप के आने की संभावना सबसे ज्यादा है।
नेपाल को दुनिया के उन देशों की श्रेणी में रखा गया है जहां भूकंप का खतरा सबसे ज्यादा है। दरअसल, नेपाल का हिमालय के क्षेत्र में स्थित होना भी इसकी एक वजह है। हिमालय पर्वत क्षेत्र से भारत का भी एक बड़ा भूभाग लगा हुआ है। लिहाजा वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी इलाके भूकंप के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील हैं। इस प्राकृतिक आपदा के बाद जिस तरह भारत सरकार की ओर से राहत और बचाव कार्य में तत्परता दिखाई गई है वह तारीफ के योग्य है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक तरफ देश के प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा दूसरी तरफ नेपाल के राष्टÑपति से बात करके हालात का जायजा लेना और उसके आधार पर राहत अभियान चलाने का कदम उठाना सराहनीय कदम है। उन्होंने पड़ोसी देश नेपाल को शीघ्र से शीघ्र हरसंभव सहायता प्रदान करने के लिए व्यापक उपायों पर अमल शुरू कर कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिचय दिया है। वहीं आश्वस्त किया हैकि मुश्किल घड़ी में भारत नेपाल के साथ खड़ा है।
भारत ने एनडीआरएफ व डॉक्टरों की कई टीमें वहां भेजी है। साथ ही एयरफोर्स के कई विमानों को राहत कार्य में लगाया गया है। वहां कल से अब तक तीस से अधिक आफ्टरशॉक आ चुके हैं। भारत में भी कई झकटे महसूस किए गए हैं जिससे लोगों में दहशत का माहौल है। हम प्राकृतिक आपदाओं को रोक नहीं सकते हैं, लेकिन उनसे बचाव के लिए जरूरी तैयारी कर सकते हैं।
भूकंप से जानमाल की कम से कम क्षति हो इसके लिए एक तो अभी से तय किया जाना चाहिए कि आगे जो भी निर्माण कार्य हों वे भूकंपरोधी तकनीकी से लैस होंगे। पूरानी इमारतों व पुलों को भी दुरुस्त किया जाना चाहिए। भूकंप आने पर क्या किया जाना चाहिए उसके प्रति भी जन-जन को जागरूक किया जाना चाहिए जिससे अधिक से अधिक लोगों को बचाया जा सके। हालांकि विडंबना ही है कि हर बार ऐसी त्रासदी के दौरान सजग होने का दंभ भरा जाता है, लेकिन मामला शांत होने के बाद तैयारियों की कोई सुध नहीं ली जाती है।
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