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चुनावों से पूर्व एनडीए के बढ़ते कुनबे के निहितार्थ

कांग्रेस नेतृत्व तो अपने कुनबे को भी एकजुट नहीं रख पा रहा है।

चुनावों से पूर्व एनडीए के बढ़ते कुनबे के निहितार्थ
नई दिल्ली. जैसे-जैसे आम चुनाव की तारीखें नजदीक आ रही हैं, भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का कुनबा बढ़ता जा रहा है। यही नहीं दूसरे दलों के कई वरिष्ठ नेता भी अब भाजपा में संभावना देखने लगे हैं। पार्टी का उत्तर व मध्य भारत में एक मजबूत जनाधार तो मौजूद है ही, वहीं अब दक्षिण और पूवरेत्तर भारत में भी उसे नए सहयोगी मिलते जा रहे हैं। हालांकि दक्षिण भारत के कर्नाटक में भाजपा की सरकार रह चुकी है, लेकिन अब तमिलनाडु में भी उसे एक भारी सफलता मिली है।
दरअसल, राज्य के पांच क्षेत्रीय दलों डीएमडीके, पीएमके, एमडीएमके, आईजेके और केएमडीके के साथ उसका गंठबंधन कई मायनों में अहम साबित हो सकता है। अब तमिलनाडु एक दिलचस्प मुकाबले का केंद्र बन सकता है। गत दिनों दलित नेता उदित राज की इंडियन जस्टिस पार्टी का भाजपा में शामिल होने से पार्टी को मजबूती मिली है। बिहार में रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा की भी एनडीए में वापसी हुई है।
महाराष्ट्र में किसानों की सबसे बड़ी पार्टी स्वाभिमान शेतकारी संगठन और आरपीआई से भी गठबंधन हुआ है। वहीं जगदंबिका पाल, रामकृपाल यादव, सतपाल महाराज, राजू र्शीवास्तव, र्शीरामुलु और डी पुरंदेश्वरी के भाजपा में शामिल होने से मजबूती मिली है। यही नहीं असम में असम गण परिषद के कईनेताओं ने भी भाजपा का दामन थामा है। साथ ही पश्चिम बंगाल की दाजिर्लिंग सीट पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने पार्टी के उम्मीदवार को सर्मथन देने की घोषणा की है। खुद पार्टी के अंदर भी टिकटों की मारा-मारी दिख रही है। जाहिर है आज भाजपा के पक्ष में एक माहौल दिखाई दे रहा है।
गत वर्ष जब नरेंद्र मोदी को पार्टी ने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कियाथा तब आलोचकों ने कहा था कि पार्टी को सहयोगी मिलना मुश्किल हो जाएगा, लेकिन मौजूदा हालात आलोचकों की उस भविष्यवाणी को झुठला रहे हैं। वहीं हमारे सामने एक दूसरी तस्वीर भी है। कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं। पी चिदंबरम अपने बेटे को लोकसभा का टिकट दिला कर अलग हो गए हैं। कैप्टन अमरिंदर भी अमृतसर से जेटली के खिलाफ चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हो रहे हैं। इससे पता चल रहा हैकि कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के मन में चुनावों को लेकर एक घबराहट है।
कांग्रेस नेतृत्व तो अपने कुनबे को भी एकजुट नहीं रख पा रहा है। उसके सहयोगी धीरे-धीरे उसे छोड़ रहे हैं। एम करुणानिधि की डीएमके और के चंद्रशेखर राव की टीआरएस ने खुद को पहले ही अलग कर लिया था। वहीं केंद्र में कांग्रेस के सहयोगी रहे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बसपा प्रमुख मायावती चुनावों से पूर्व उसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं। एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान अलग हो ही गए हैं। इससे देश में कांग्रेस के प्रति कोई अच्छे संकेत नहीं जा रहे हैं। यदि ऐसे ही चलता रहा तो कांग्रेस की जो कुछ थोड़ी संभावना दिख रही थी, वह भी खत्म हो सकती है। क्योंकि चुनावों में माहौल और परसेप्शन से ही परिस्थितियां बनती या बिगड़ती हैं। निश्चित रूप से भाजपा के पक्ष में माहौल दिख रहा है।
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