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सोनिया की अंतरात्मा की आवाज का सच

राहुल को डर था कि सोनिया भी उनके पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी की तरह मार दी जाएंगी।

सोनिया की अंतरात्मा की आवाज का सच
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जिस एक मजबूत आधार पर किसी की पूरी राजनीतिक छवि टिकी हो, और फिर बाद में पता चले कि वह काल्पनिक या बनावटी है तो क्या होगा? नेहरू-गांधी परिवार के सबसे विश्वस्त करीबियों में से एक रहे पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी आने वाली किताब वन लाइफ इज नॉट एनफ - एन आॅटोबायोग्राफी में जो दावे किए हैं उसे यदि सही माने तो बीते दस वर्षों की सोनिया गांधी की राजनीतिक छवि एक खोखले सच पर टिकी थी। नटवर सिंह ने दावा किया है कि 2004 में सोनिया गांधी प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बनी थीं क्योंकि राहुल गांधी की जिद थी कि सोनिया को किसी भी सूरत में प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए। उनको डर था कि सोनिया भी उनके पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी की तरह मार दी जाएंगी। अर्थात इस प्रकरण को जिस तरह से प्रचारित किया गया उस तरह ये सोनिया की अंतरात्मा की आवाज नहीं थी। नटवर सिंह ने 18 मई, 2004 की एक खास बैठक का जिक्र किया है। इस बैठक में मनमोहन सिंह, गांधी परिवार के मित्र सुमन दुबे, प्रियंका और वो मौजूद थे। कांग्रेस के इतिहास को देखते हुए एक बेटे को अपनी मां को खोने का डर होना उचित है परंतु इसे जिस तरह प्रचारित किया गया वह सही नहीं था। इससे तो यही आभास होता है कि कांग्रेसी राजनीतिक लाभ के लिए सोनिया गांधी को त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में पेश कर रहे थे। इस दावे से इस आरोप का भी पटाक्षेप होता दिख रहा है,जिसमें कहा गया था कि तत्कालीन राष्टÑपति अब्दुल कलाम ने विदेशी मूल के कारण सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोका था। नटवर सिंह ने 2008 में कांग्रेस छोड़ दी थी, 2005 में इराक में अनाज के बदले तेल के घोटाले के आरोप के चलते उन्हें यूपीए-1 सरकार से इस्तीफा देना पड़ा था। नटवर सिंह कांग्रेस से करीब से जुड़े रहे हैं। लिहाजा उनकी बातों को सिरे से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रियंका और सोनिया गांधी का नटवर सिंह के घर जाकर इस सच को अपनी जीवनी में शामिल न करने की गुजारिश भी संदेह को पुख्ता कर रहा है। नटवर सिंह ने यह भी कहा हैकि भले ही मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे पर सुपर पावर सोनिया गांधी के हाथों में था। महत्वपूर्ण फाइलों पर अंतिम फैसला सोनिया ही लेती थीं। इससे पहले संजय बारू की किताब एन एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर द मेकिंग एंड अनमेकिंग आॅफ मनमोहन सिंह और पूर्वकोल सचिव की किताब क्रूसेडर आॅर कांस्पिरेटर-कोलगेट एंड अदर ट्रूथ में भी यह खुलासा हो चुका है। इससे प्रतीत होता हैकि दस वर्षों तक केंद्र सरकार में सत्ता के दो केंद्र बने रहे। इसकी वजह से प्रधानमंत्री के अनिर्णय की स्थिति में रहने से देश को अपूर्णीय क्षति हुई है। कांग्रेसी नटवर सिंह की कितनी भी आलोचना क्यों न कर लें, परंतु इस पर बहस का कोई खास औचित्य नहीं है कि उनको ऐसी किताब लिखनी चाहिए या नहीं। कोई भी अपने अनुभवों को लिख सकता है। सोनिया गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि वे भी एक किताब लिखकर सच सामने लाएंगी परंतु तब तक यह सवाल जरूर बना रहेगाकि उन्होंने पद छोड़ने के वास्तविक सच को ज्यों का त्यों रखने की बजाय देश के सामने झूठी तस्वीर क्यों पेश की?
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