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मातृ मृत्यु दर का यह आंकड़ा चिंताजनक

1990 में जहां प्रति एक लाख शिशु जन्म पर मातृ मृत्यु दर 569 थी, वह 2013 में कम हो कर 190 रह गई है।

मातृ मृत्यु दर का यह आंकड़ा चिंताजनक
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नई दिल्ली. संयुक्त राष्ट्र के इस रिपोर्ट पर कुछ देर के लिए खुश हुआ जा सकता है कि बीते दो दशकों के दौरान देश में मातृ मृत्यु दर में कमी आई है, परंतु अभी जो हालात हैं वे हमारी इस क्षणिक खुशी को गायब करने के लिए काफी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1990 में जहां प्रति एक लाख शिशु जन्म पर मातृ मृत्यु दर 569 थी, वह 2013 में कम हो कर 190 रह गई है।
बीते दो दशकों में इसमें करीब 65 फीसदी की कमी आई है, लेकिन वहीं इसका दूसरा पहलू भी है कि प्रिगनेंसी संबंधी परेशानियों और प्रसव के दौरान दुनिया भर में होने वाली मृत्यु में भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी है। अर्थात भारत इस मामले में शीर्ष पर है। इसके बाद 14 फीसदी के साथ नाइजीरिया का स्थान है। पिछले वर्ष वैश्विक मातृ मृत्यु के एक तिहाई मामले अकेले नाइजीरिया और भारत में आए।
देश में 2013 में प्रति एक लाख शिशु जन्म पर मातृ मृत्यु का 190 का आंकड़ा भी भारत सरकार के लक्ष्य से काफी ज्यादा है। सरकार ने 2012 में ही इसे सौ के नीचे लाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। यह विफलता दुर्भाग्यपूर्ण है। इसके अलावा मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए मातृ मृत्यु दर में औसतन प्रति वर्ष 5.5 प्रतिशत या उससे अधिक की कमी लानी है, परंतु आलम यह है कि भारत को पिछले 23 वर्षों में 4.5 प्रतिशत का आंकड़ा छूने में ही पसीने छूट रहे हैं। यदि हालात ऐसे ही रहे तो 2015 तक मातृ मृत्यु दर के आंकड़े को 109 तक लाना कठिन हो जाएगा।
भारत में प्रति वर्ष 26 मिलियन प्रसव होते हैं, इतनी तादाद में महिलाओं की मृत्यु चिंताजनक है। मौत की वजह स्वास्थ्य सेवाओं का पर्याप्त न होना, प्रसव के दौरान ज्यादा खून बहना और संक्रमण तथा प्रिगनेंसी के दौरान उच्च रक्त चाप का बना रहना है। वहीं शिशु जन्म के पहले या दौरान या बाद में उचित देखभाल नहीं होना भी मातृ मृत्यु का कारण बनता है। मातृ मृत्यु में उन मौतों को शामिल किया जाता है, जो प्रिगनेंसी के दौरान या शिशु के जन्म के 42 दिन के भीतर होती हैं। इसे रोकने का कारगर तरीका यही है कि शिशु का जन्म अस्पतालों में कराया जाए, परंतु देश में न तो पर्याप्त अस्पताल हैं और न ही पर्याप्त स्वास्थ्य कर्मी। दूर दराज के इलकों में तो हालात और भी खराब हैं।
देश में 2005 में इसके लिए योजना चलाई गई थी, परंतु उसके परिणाम आशा अनुरूप नहीं रहे हैं। यूनाइटेड नेशसं पॉपुलेशन फंड-इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 2008 में उत्तर प्रदेश और बिहार में 50 फीसदी, राजस्थान में 41 फीसदी से ज्यादा महिलाओं ने अपने घरों पर शिशु को जन्म दिया। दूसरा, ज्यादा से ज्यादा ऐसी महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जो कौशलपूर्वक प्रसव करा सकें, परंतु यूनिसेफ की 2008 की रिपोर्ट के अनुसार कई राज्यों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता बेहद निम्न स्तर की पाई गई है।
यूनिसेफ की ही 2013 की रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य केंद्रों की बदहाली भी इसके लिए काफी जिम्मेदार है, जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर स्वास्थ्य कर्मियों की अनुपलब्धता और जरूरी उपकरणों, दवाओं की कमी। ऐसे में आज जरूरत बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाते हुए गंभीर कदम उठाने की है जिससे कि प्रसव के दौरान महिलाओं को आकाल मौत से बचाया जा सके।
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