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कई सवाल पैदा कर गया संसद का मानसून सत्र

लोकसभा अध्यक्ष ने हंगामे के बीच ही सदन को चलाने का प्रयास किया, लेकिन राज्यसभा में वह भी नहीं हो पाया।

कई सवाल पैदा कर गया संसद का मानसून सत्र
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बीते महीने की 21 जुलाई से शुरू हुए संसद के मानसून सत्र को लेकर देश बड़ी उम्मीदें पाल रखा था, लेकिन अफसोस है कि विपक्ष खासकर कांग्रेस के हंगामे के कारण सारा सत्र बर्बाद हो गया। इस सत्र को कई नकारात्मक बातों के लिए याद किया जाएगा। साथ ही माननीयों के अर्मयादित आचरण के कारण हमारा संसदीय लोकतंत्र एक नई निम्नता देखने को विवश हुआ। न तो माननीयों ने संसद के नियमों व र्मयादाओं का मान रखा न ही लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद की गरिमा रखी।

वहीं आरोप प्रत्यारोप इतने निजी हो गए कि तकरें और तथ्यों से परे होकर बातें कही जाने लगीं। इन दिनों कई राज्यों में बाढ़ आई हुई है। देश के किसान बदहाल हैं। युवाओं के हाथों में रोजगार नहीं है। देश पर आतंक का साया मंडरा रहा है। अर्थव्यवस्था सुधार की मांग कर रही है। देश की जनता संसद की ओर नजरें टिकाई थी कि वह इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगी, लेकिन यह दुखद है कि कुछ सांसदों द्वारा सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए जनआकांक्षाओं के सर्वोच्च मंच को इन विषयों पर बहस करने और कानून बनाने से रोक दिया गया।

दरअसल, कांग्रेस और वामपंथी दल जिस ललित मोदी के कथित मदद को लेकर सुषमा स्वराज के इस्तीफे पर अड़े थे और जिसके कारण संसद को इतने दिनों तक बाधित रखे, तथ्यों से साफ हो गया है कि वे इस संबंध में देश को गुमराह कर रहे हैं। यही नहीं ललितगेट का जो फंदा कांग्रेस ने मोदी सरकार पर फेंका था वह अब उसी के गले पड़ गया है। साफ हो गया है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ही ललित मोदी को बचाने का काम किया। इस सत्र में एक भी महत्वपूर्ण बिल पास नहीं हो पाया। भूमि अधिग्रहण विधेयक पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट आने में देरी से उसे शीत सत्र के लिए टाल दिया गया है।

वहीं सबको उम्मीद थी कि इस बार कर सुधार की दिशा में क्रांतिकारी माना जाने वाला वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी बिल पास हो जाएगा, लेकिन यह भी राजनीति की भेंट चढ़ गया। जीएसटी लागू होने से पूरा देश एक बाजार में तब्दील हो जाता जिससे अर्थव्यवस्था में दो फीसदी की वृद्धि होने की गुंजाइश है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार इस साल का बजट सत्र पिछले 15 साल में सबसे अच्छा था। लोकसभा ने अपने निर्धारित समय से 125 फीसदी और राज्यसभा ने 101 फीसदी काम किया पर मानसून सत्र में ऐसा नहीं हो सका। पूरे सत्र में कामकाज के लिए निर्धारित कुल 176 घंटों में से 119 घंटे हंगामे की भेंट चढ़ गए। यानी दोनों सदनों में निर्धारित समय का सिर्फ 32 फीसदी ही कामकाज हो पाया।

हालांकि लोकसभा अध्यक्ष ने हंगामे के बीच ही सदन को चलाने का प्रयास किया, लेकिन राज्यसभा में वह भी नहीं हो पाया। इससे देश को 260 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। लोकसभा के एक घंटे की कार्यवाही पर सरकारी खजाने से 1.5 करोड़ और राज्य सभा में 1.1 करोड़ रुपये खर्च होता है। सवाल है कि संसद को बंधक बनाने से विपक्ष को क्या हासिल हुआ? हो सकता है कि इस राजनीति के बल पर वह चर्चा में बनी रहे, लेकिन उसके इस रवैए से अंतत: देश के विकास की राह में एक अवरोध जरूर पैदा हो गया है।

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