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सुस्त, चलताऊ छवि से बाहर निकलें अफसर

जन शिकायतों के निपटारे में अफसरों की ढिलाई के चलते मोदी को अधिकारियों की क्लास लगानी पड़ी।

सुस्त, चलताऊ छवि से बाहर निकलें अफसर
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केंद्र सरकार के अफसरों-कर्मियों के सुस्त व ढीले रवैये पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खिन्न होना लाजिमी है। उनको सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क क्षेत्र से संबंधित लोगों की शिकायतों के हल नहीं होने के बारे में जानकारी मिली। इसको उन्होंने गंभीरता से लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का निर्देश दिया। इसके साथ ही उन्होंने सभी सचिवों से शिकायतों की तत्काल शीर्ष स्तर पर निगरानी के लिए एक व्यवस्था बनाने को भी कहा। जन शिकायतों के निपटारे में अफसरों की ढिलाई के चलते उन्हें अधिकारियों की क्लास लगानी पड़ी। इसमें सख्त संदेश देना पड़ा है कि अब काम नहीं करने वाले निकम्मे अफसर निकाल बाहर किए जाएंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि विकास के एजेंडे को लागू करने के लिए पीएम मोदी जिस तेजी और तत्परता से सरकारी कामकाज चाहते हैं, अधिकांश अफसर और कर्मचारी उस उम्मीद पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। इसकी भी वजह है। दरअसल, भारत में नौकरशाही की छवि सुस्त, भ्रष्ट और काम में अड़ंगे डालने वाली रही है, तो सरकारी दफ्तरों में ‘काम नहीं करने की संस्कृति’ हावी रही है और कल आना का एटिट्यूड रहा है। शायद इसलिए आम जनमानस में परसेप्शन है कि यदि हमारी नौकरशाही ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ होती और सरकारी कार्यालयों में तेज गति से काम होता तो आज भारत जहां है, उससे पचास गुणा आगे होता। भारत विकसित राष्ट्रों में शुमार होने के कगार पर होता और देश पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादों जरूरतों को पूरा कर लिया होता। इतना ही नहीं, सरकारें गरीबी उन्मूलन के लिए योजनाएं नहीं बना रही होतीं और उन्हें पग-पग पर सब्सिडी नहीं देनी पड़तीं? लेकिन आजादी के बाद से अब तक खरबों रुपये की योजनाएं चलने के बावजूद देश अब भी नागरिकों की बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। यहां तक कि अभी 18 हजार गांव ऐसे हैं, जहां बिजली नहीं पहुंची है। भ्रष्टाचार अब भी सरकारी सिस्टम से खत्म नहीं हो पाया है। मोदी सरकार आने के बाद से कम जरूर हुआ है, लेकिन उसका उन्मूलन नहीं हुआ है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा करप्शन परसेप्शन इंडेक्स 2015 रिपोर्ट के मुताबिक 168 देशों में भारत का स्थान 76वां है, एक साल पहले 85वां था। भ्रष्टाचार के मोर्चे पर भारत भूटान से भी नीचे है। इसका मतलब है कि अभी भी हमारे सरकारी कामकाज वर्षों से चले आ रहे चलताऊ र्ढे पर ही है। हमारे केंद्रीय कर्मी किस सुस्ती से काम करते हैं, यह बात नरेंद्र मोदी को भी पता थी, इसलिए पीएम का पद संभालने के बाद उन्होंने सीधे केंद्रीय सचिवों की बैठक की थी। इस तरह की बैठक देश के किसी प्रधानमंत्री की पहली बैठक थी। इस बैठक का मकसद साफ था कि सरकारी अफसर सुस्त रवैये को छोड़ें, तेजी से फैसले लें और विकास के एजेंडे को लागू करें। पीएम खुद 16 से 18 घंटे काम करते हैं और पद संभालने के बाद से एक दिन का भी अवकाश नहीं लिया है। ऐसे में सरकारी अफसरों और कर्मियों को भी चाहिए कि वे अपने ढीले रवैये को त्यागें, जनता के प्रति जवाबदेही समझें और त्वरित फैसले लेकर अपनी छवि सुधारें।
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