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मोदी सरकार की चुस्ती से कंट्रोल में वित्तीय घाटा

वित्त मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 में वित्तीय घाटा कुल जीडीपी का 3.9 फीसदी के करीब रहेगा।

मोदी सरकार की चुस्ती से कंट्रोल में वित्तीय घाटा
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के रिफॉर्म से जुड़े फैसलों का असर दिखने लगा है। प्रसाशनिक और आर्थिक क्षेत्र में सुधारों का कमाल है कि सात साल में पहली बार वित्तीय घाटा चार फीसदी से कम रहने के अनुमान हैं। वित्त मंत्रालय के मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 में वित्तीय घाटा कुल जीडीपी का 3.9 फीसदी के करीब रहेगा। वित्त वर्ष 2007-08 में यह घाटा 2.7 फीसदी था। इस बीच वित्त वर्ष 2008-09 से 2013-14 के बीच वित्तीय घाटा उच्चतम 6.8 फीसदी और न्यूनतम 4.5 फीसदी के बीच रहा। इन वर्षों में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री पी चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की तिकड़ी के यूपीए सरकार में रहने के बावजूद कभी भी वित्तीय घाटा चार फीसदी से नीचे नहीं आया। लेकिन केंद्र में सत्ता संभालते ही मोदी सरकार ने सरकारी खर्च पर लगाम, टैक्स सुधार, विनिवेश, गैर जरूरी सब्सिडी पर नियंत्रण से जुड़े फैसले लेकर वित्तीय घाटा को अनुमान से नीचे लाने की जमीन तैयार कर दी है। मोदी सरकार ने सबसे पहले मंत्रिमंडल का आकार छोटा किया, अफसरों की महंगे होटलों में मीटिंग व विदेशी टूर जैसे फिजूलखर्ची पर रोक लगाई, मंत्रियों के विदेशी दौरे व मंत्रालयों की फाइव स्टार होटलों में मीटिंग पर अंकुश लगाया। बजट में कई टैक्स सुधार किए। अनावश्यक टैक्स हटाए गए व कई टैक्सों की दरें कम की गर्इं। र्इंधन और फूड सब्सिडी पर खर्च को तकसंगत बनाया गया। एफडीआई के लिए महौल बनाया गया और कई क्षेत्र में एफडीआई की सीमा बढ़ाई गई। सरकार ने कई पीएसयू में विनिवेश के फैसले किए हैं। इन निर्णयों के असर से खाद्य सुरक्षा पर होने वाले खर्च में सरकार के 20 हजार करोड़ रुपये बचेंगे, टैक्स सुधार से 9.77 लाख करोड़ रुपये करों के रूप में आएंगे, पीएसयू में विनिवेश से 58 हजार करोड़ रुपये सरकारी खाते में आएंगे। इसके साथ ही कच्चे तेल में गिरावट से सरकारी खजाने में 10 हजार करोड़ रुपये की बचत होगी और रिजर्व बैंक ने सरप्लस मनी के रूप में 56 हजार करोड़ रुपये सरकार को दिए। इस तरह कुल करीब 10.21 लाख करोड़ रुपये की बचत के अनुमान की बदौलत मोदी सरकार अपने वित्तीय घाटा को चार फीसदी (बजट अनुमान 4.1 फीसदी) से नीचे लाने में सफल होगी। किसी वित्त वर्ष के दौरान सरकार की कुल आमदनी (उधारी को छोड़ कर) से कुल खर्च अधिक रहने का अंतर बताने वाला वित्तीय घाटा बढ़ेगा तो सरकार की उधारी बढ़ेगी। अगर उधारी बढ़ेगी तो ब्याज अदायगी भी बढ़ेगी। ब्याज का बोझ बढ़ने से सरकार के राजस्व घाटे पर नकारात्मक असर पड़ेगा। ब्याज दरें बढ़ेंगी, जिससे महंगाई बढ़ेगी। इसलिए सरकार की वित्तीय सेहत ठीक रखने के लिए वित्तीय घाटे को न्यूनतम रखना जरूरी है और मोदी सरकार इस प्रयास में सफल होती दिख रही है। आगे अगर मोदी सरकार इसी तरह वित्तीय अनुशासन से चलती रही तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले दो साल में वित्तीय घाटे को तीन फीसदी के स्तर पर लाया जा सकता है।

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