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मोदी सरकार को बदनाम करने की गहरी साजिश

भारत किसी भी प्रकार की असहिष्णुता के सिद्धांतों को सहन नहीं करता है।

मोदी सरकार को बदनाम करने की गहरी साजिश
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भारत किसी भी प्रकार की असहिष्णुता के सिद्धांतों को सहन नहीं करता है। हमारा समाज हमेशा सौहार्द व शांति का पक्षधर रहा है। सरदार पटेल की जयंती पर स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि विकास के लिए एकता, शांति और सौहार्द जरूरी शर्त हैं। जाहिर है, हमारा समाज पुराने जख्मों को भूलाकर सामान्य र्ढे पर आने को तत्पर है, लेकिन पहले साहित्यकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक और अब इतिहासकारों का एक खास वर्ग उसमें दरार पैदा करता प्रतीत हो रहा है। उनका कहना है कि देश में कथित तौर पर असहिष्णुता बढ़ी है। उन्हें बोलने की आजादी पर तथाकथित खतरा नजर आ रहा है। अब इस मुहिम में कांग्रेस भी कूद गई है जिस पर 84 में राजधानी में सिखों के नरसंहार का आरोप है। ऐसा लगता है कि यह विरोध राजनीति से प्रेरित है क्योंकि जो लोग असहिष्णुता का ठप्पा लगाकर मोदी सरकार को बदनाम कर रहे हैं वे खास विचारधारा के हिमायती माने जाते रहे हैं। इस प्रकार यह अब वैचारिक लड़ाई ज्यादा लग रही है।

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वित्तमत्री अरुण जेटली ने कहा है कि इस तरह की वैचारिक असहिष्णुता के मोदी लंबे समय से शिकार रहे हैं। विरोधी लोग जिन घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं कि उसमें दादरी की घटना, कर्नाटक के कन्नड़ लेखक एम कलबुर्गी और महाराष्ट्र में नरेंद्र दाभोलकर की हत्या शामिल है। वे इसमें गोवध और गोमांस सेवन के विरोध को भी शामिल कर रहे हैं। यदि तथ्यों पर नजर डालें तो इन घटनाओं से मोदी सरकार का कोई लेना देना नहीं है। दादरी की घटना उत्तर प्रदेश में हुई है। वहां इस समय समाजवादी पार्टी की सरकार है। कलबुर्गी की हत्या कर्नाटक में हुई है जहां कांग्रेस की सरकार है। वहीं महाराष्ट्र में जब दाभोलकर हत्या हुई थी तब राज्य और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। ऊधमपुर में गोवंश की तस्करी के संदेह में हुई हत्या अवश्य भाजपा और उसके सहयोगी दल द्वारा शासित जम्मू-कश्मीर में हुई। स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाना पसंद करने वाले ये लोग क्यों भूल रहे हैं कि कानून व्यवस्था राज्यों का विषय है। केंद्र सरकार चाहकर भी राज्य सरकारों की र्मजी के बगैर किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकती। बेहतर होगा कि वे राज्यसरकारों पर दबाव डालें जिससे कि कानून व्यवस्था दुरुस्त हो सके ताकि ऐसी घटनाएं फिर न होने पाएं। वहीं यदि ऐसी घटनाएं दुर्भाग्यपूर्वक हो भी जाती हैं तो राज्य सरकारें सुनिश्चित करें कि दोषियों को पकड़ कर कड़ी से कड़ी सजा दी जा सके। वहीं गोवध के खिलाफ तो वर्षों पहले कानून बनाया गया था।

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इन अभियानों में शामिल ज्यादातर लोग एक खास विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते प्रतीत हो रहे हैं। जिनमें से कई ने आम चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देने की सार्वजनिक अपील की थी। आशंका इसलिए भी हो रही है कि इसके पहले किसी ने ऐसा अभियान नहीं चलाया जबकि पहले जानबूझकर न सिर्फ दंगे कराए गए थे, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने की कोशिश हुई थी। जाहिर है, विरोध करने वालों के इरादे किसी संकीर्ण राजनीति से प्रेरित दिख रहे हैं। इसमें मोदी सरकार को बदनाम करने की गहरी साजिश नजर आ रही है। अब उन्हें सम्मानों के प्रति असहिष्णुता व असम्मान का प्रदर्शन करना बंद कर देना चाहिए। भारत जैसे देश में कुछ घटनाओं के आधार पर इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जाना चाहिए कि यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी जा रही है और सहिष्णुता खत्म हो रही है।

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