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चिंतन: महिलाओं के प्रति ऐसी असंवेदनशीलता क्यों

बलात्कार पूरे समाज के खिलाफ किया गया अपराध है।

चिंतन: महिलाओं के प्रति ऐसी असंवेदनशीलता क्यों
जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से आशा की जाती है कि वे देश, समाज, संस्था और कानून से जुड़े किसी मुद्दे पर संवेदनशीलता से पेश आएंगे और जो उचित है उसी के पक्ष में तर्क देंगे। उनके मातहत भी जिसका अनुसरण करते हैं और देश एक सही दिशा में अग्रसर होते हुए सबके कल्याण को सुनिश्चित करती है परंतु जब ये लोग ही असंवेदनशील हो जाएंगे और भौंडा बयान देने लगेंगे तो समझा जा सकता है कि देश किस ओर जा रहा है।
तृणमूल कांग्रेस के सांसद तापस पाल ने अपने विरोधियों के परिवारों की महिलाओं को लेकर दिए शर्मनाक बयान पर भले ही बिना शर्त माफी मांग ली, लेकिन इससे एक बात तो पूरी तरह जगजाहिर हो जाती हैकि महिलाओं के प्रति वे कितने असंवेदनशील हैं। उन्होंने जिस तरह उकसाने वाला बयान दिया है, किसी सभ्य समाज में उसकी कोई जगह नहीं है।
हालांकि तापस पाल ऐसे पहले सांसद नहीं हैं जिन्होंने महिलाओं के प्रति ऐसी ओछी बयानबाजी की है। इससे पहले लोकसभा चुनावों के दौरान समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने तो बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को महज लड़कों की एक भूल करार दिया था और बलात्कारियों को फांसी न देने तक की वकालत की थी।
गत वर्ष सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा ने क्रिकेट में सट्टेबाजी की तुलना बलात्कार जैसे घृणित अपराध से करते हुए कहा था कि अगर सट्टेबाजी को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेना चाहिए। ठीक उसी तरह जैसे अगर बलात्कार को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेते हैं। कई अन्य जनप्रतिनिधि भी महिलाओं की गरिमा को तार-तार करने वाले इस तरह के बेशर्म बयान देते सुने गए हैं। महिलाओं से जुड़े यौन उत्पीड़न पर इससे ज्यादा असंवेदनशील बयान और कुछ नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा हैकि बलात्कार जैसा अपराध न केवल एक महिला के शरीर बल्कि आत्मा पर हमला है। यह नैतिक और शारीरिक रूप से सबसे ज्यादा निंदनीय अपराध है।
बलात्कार पूरे समाज के खिलाफ किया गया अपराध है। इसके कारण महिला को ऐसा जख्म मिलता है, जो जीवन भर नहीं भरता। फिर भी ऐसी असंवेदनशीलता चिंताजनक है। जब निर्वाचित सांसदों व अधिकारियों की यह धारणा है तो छोटे स्तर पर हालात क्या होंगे, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। पिछले महीने लोकसभा सांसदों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी से अनुरोध किया था कि वे बलात्कार जैसे घृणित अपराध का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण बंद करें, ऐसी बयानबाजी शोभा नहीं देती।
दरअसल, यहां सारी समस्या मानसिकता की है, तापस पाल जैसे लोग इसके उदाहरण बनकर सामने आए हैं। हम समझ सकते हैं कि ऐसी धारणा रखने वाले लोग कैसी व्यवस्था देंगे? महिलाएं आज सबसे ज्यादा हिंसा की शिकार हो रही हैं और असुरक्षित महसूस कर रही हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह धारणा भी काम कर रही है। तृणमूल कांग्रेस इस मामले से पल्ला नहीं झाड़ सकती है। तापस पाल के खिलाफ ऐसी कारवाई होनी चाहिए, जिससे जनप्रतिनिधियों और उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को सबक मिल सके। चूंकि वे सांसद हैं, लिहाजा उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला तो बन ही सकता है।
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