Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

महिला-पुरुष असमानता को दूर करना जरुरी

देश में पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए 55 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।

महिला-पुरुष असमानता को दूर करना जरुरी
नई दिल्ली. सालों से लगातार आर्थिक प्रगति करने के बाद भी यदि भारतीय महिलाओं को स्वास्थ्य, शिक्षा और कार्यक्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले असमानता का सामना करना पड़ रहा है, तो यह कहीं न कहीं हमारी नीतियों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। हाल ही में जारी हुए जेनेवा स्थित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के वार्षिक लैंगिक समानता सूचकांक में भारत को दुनिया के 142 देशों में 114वां स्थान मिला है। पिछले साल 136 देशों की सूची में भारत 101वें स्थान पर था। वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम 2006 से प्रत्येक साल यह सर्वे कराता आ रहा है। यह सूचकांक देशों की उस क्षमता को मापता है कि उसने पुरुषों और महिलाओं को बराबर संसाधन और अवसर देने के लिए कितना प्रयास किया।
इस सूचकांक को चार श्रेणियों में बांटा जाता है-आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक सशक्तिकरण। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन फिसड्डी तो है ही वहीं कामकाजी वर्ग में हिस्सेदारी, अनुमानित कमाई, साक्षरता और लैंगिक अनुपात में यह दुनिया के सबसे खराब देशों की सूची में शामिल है। हालांकि महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण के मामले में भारत की स्थिति जरूरी अच्छी मानी जा सकती है। देश में पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए 55 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया गया है। यही वजह है कि भारत इस मोर्चे पर दुनिया में 15वें स्थान पर पहुंच गया है। मोदी सरकार के कैबिनेट में भी महिलाओं की अच्छी भागीदारी देखी जा सकती है।
आज देख सकते हैं शीर्ष से लेकर नीचे तक राजनीति में महिलाओं का दखल है। दरअसल, महिलाओं को जहां मौका मिला है उन्होंने खुद को साबित किया है। पंचायतों में महिलाओं के कामकाज इसकाबेहतर उदाहरण हैं। वहीं दूसरी तरह जीवन के कई बुनियादी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अभी कमजोर है, और देखा जाए तो लगभग सभी क्षेत्रों में महिला-पुरुष असमानता कम होने का नाम नहीं ले रही है। विगत कुछ सालों से महिलाओं के लिए नए-नए अवसर खुल रहे हैं जिसका उन्होंने फायदा भी उठाया है। आज पहले के मुकाबले ज्यादा महिलाएं घरों से निकलकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को संभाल रहीं हैं। इससे हमारा सामाजिक जीवन भी कई स्तरों पर प्रभावित हुआ है।
एक तो स्त्री-पुरुष संबंधों में खुलापन आया है वहीं महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है लेकिन इस दावेदारी को और मजबूती देने के लिए नौकरियों और कम-धंधों में उनकी भागीदारी बढ़ानी होगी। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम सूचकांक में दो बातें ध्यान देने वाली हैं- पहला, विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी का ग्राफ अभी ठहर-सा गया है। दूसरा, अच्छा करने के बाद भी महिलाओं के प्रति अनुकूल माहौल नहीं बना पा रहा है।
यदि महिला-पुरुष असमानता को दूर करना है तो भारत को इन दो मोचरें पर बड़ी लड़ाई लड़नी होगी। इस संघर्ष में समाज की भूमिका काफी अहम है, क्योंकि इस समस्या के जड़ में उसकी बनाई व्यवस्था है। प्रत्येक परिवार यदि अपनी बच्चियों को आजादी, सम्मान और सुरक्षा की गारंटी देना ठान ले तो लैंगिक असमानता की खाई को पाटना काफी आसान हो जाएगा।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि और हमें फॉलो करें ट्विटर पर-
Next Story
Top