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भारत-चीन रिश्तों के नए अध्याय की उम्मीद जगी

रविवार को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों, सुषमा स्वराज और चीन के वांग यी ने बैठक कर सीमा पर शांति बहाली की प्रतिबद्धता दोहराई।

भारत-चीन रिश्तों के नए अध्याय की उम्मीद जगी
केंद्र में नई सरकार बनने के साथ ही पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में भी गर्मजोशी साफ दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण के अवसर पर आमंत्रित सार्क देशों के साथ सफल वार्ता के बाद अब चीन के विदेश मंत्री का भारत दौरे पर आना इस बात की पुष्टि कर रहा है। भारत हमेशा से मानता रहा हैकि कोई भी देश अपने पड़ोसी को नहीं बदल सकता, लिहाजा उनके साथ मधुर रिश्ते रखने चाहिए। चीन भी अब इस बात को समझने लगा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इसी बात को दोहराते हुए कहा है कि कोई भी देश अपने पड़ोसी को नहीं चुन सकता पर रिश्ते सामान्य रखना उसके हाथ में होता है। यही वजह है कि रविवार को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों, भारत की सुषमा स्वराज और चीन के वांग यी, ने बैठक कर सीमा पर शांति बहाली की प्रतिबद्धता दोहराई। सोमवार को वांग की मुलाकात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से होगी। इस यात्रा से उम्मीद की जा रही है कि भारत और चीन के बीच विवाद के जो मुद्दे हैं उन्हें सुलझाने की दिशा में कोई ठोस पहल हो। गत वर्ष चीन के प्रधानमंत्री ली क्विंग अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा पर नई दिल्ली पहुंच थे तभी से यह माना जा रहा हैकि चीन भारत से रिश्ते सुधारना चाहता है। चीन के नेता कहते रहे हैं कि युद्ध अब बीते जमाने की बात हो गई है पर दोनों देशों के बीच अभी भी ऐसे ढेरों विवादित मुद्दे हैं जिन्हें सुलझाना जरूरी है। क्योंकि इनके कारण कई बार संबंधों में तल्खी आ जाती है। इनके बीच सीमा विवाद का मुद्दा सालों से है। जिसके चलते चीन की ओर से बार-बार घुसपैठ होती रहती है। वह अरुणाचल प्रदेश को भारत का अंग नहीं मानता है। वहां के त्वांग और लद्दाख के अक्साई चिन पर अपना दावा उसने नहीं छोड़ा है। जब भी भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति वहां दौरे पर जाते हैं चीन की ओर से आपत्ति जताई जाती है। वहीं कश्मीरियों को नत्थी वीजा देने का मामला आम है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एशिया की दोनों महाशक्तियों के द्विपक्षीय संबंध से विश्व की अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि राजनीति भी प्रभावित होती है। दोनों की संयुक्त आबादी ढाई अरब है। इसमें बाजार के निर्वाहक मध्यवर्ग की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। इसीलिए दोनों के आपसी रिश्ते विश्व बाजार को एक नई दिशा दे सकते हैं। भारत और चीन के वर्तमान रिश्तों में व्यापार सबसे महत्वपूर्ण घटक रहा है। पिछले एक दशक में दोनों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में करीब बीस गुना बढ़ोतरी हुई है। आज विश्व में सबसे ज्यादा व्यापार इनके बीच ही हो रहा है। अभी यह आंकड़ा 70 बिलियन डॉलर है। इसमें और वृद्धि की संभावना है लेकिन यह तभी संभव है, जब दूसरे विवादों को सुलझा लिया जाए। हालांकि सीमा विवाद पर दोनों के बीच वार्ता का दौर जारी है, जिसे अभी अंजाम तक पहुंचने में वक्त लगेगा। लिहाजा भारत-चीन के रणनीतिकार चाहते हैं कि दोनों देश पहले अपने बीच कारोबार को बढ़ाने पर ध्यान दें। ऐसा माना जा रहा है कि यदि दोनों देश व्यापार को बढ़ाते जाएंगे तो बाकी मुद्दे भी अपने आप सुलझने की दिशा में बढ़ने लगेंगे। भारत यही रणनीति अपने दूसरे पड़ोसी देशों के साथ भी अपनाते हुए दिख रहा है।
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