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कच्चे तेल की कीमत में गिरावट के मायने

कच्चे तेल के उत्पादन के मौजूदा स्तर में अभी किसी भी तरह की कटौती नहीं होगी।

कच्चे तेल की कीमत में गिरावट के मायने
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बृहस्पतिवार को वियना में संपन्न हुई ओपेक (ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज) के 12 सदस्य देशों के ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि वे कच्चे तेल के उत्पादन के मौजूदा स्तर में अभी किसी भी तरह की कटौती नहीं करेंगे। अब इनकी अगली बैठक अगले साल जून में होगी। तब तक ओपेक देश प्रति दिन तीन करोड़ टन बैरल कच्चे तेल का उत्पादन जारी रखेंगे। इसका अर्थ हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति निकट भविष्य में प्रभावित नहीं होगी।

अभी आपूर्ति के मुकाबले मांग कम होने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की गुंजाइश नहीं है, बल्कि आने वाले दिनों में इसमें और गिरावट आने की संभावना देखी जा रही है। अभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 76 डॉलर प्रति बैरल है। चार साल बाद कीमत इतनी नीचे आई है और हालात यही बने रहे तो विशेषज्ञों का अनुमान है कि इसकी कीमत गिरकर 60 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। इस साल जून के महीने से अब तक कच्चे तेल की कीमत में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करीब 30 फीसदी की गिरावट आई है। कच्चे तेल की गिर रही कीमत की वजह वैश्विक स्तर पर आई इसकी मांग में कमी बताई जा रही है।

आज चीन, जापान और यूरोपियन यूनियन के कई देशों में आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो गई है। इसके अलावा अभी भी कईदेश पूरी तरह आर्थिक मंदी से उबर नहीं पाए हैं। यही वजह है कि विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित कई प्रतिष्ठित संस्थाओं ने भी अनुमान व्यक्त किया है कि आने वाले कुछ सालों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती बनी रहेगी। वहीं एक दूसरी वजह अमेरिका में बड़ी मात्रा में र्इंधन के विकल्प के रूप में शेल ऑयल के उत्पादन की खबरें हैं। इस कारण माना जा रहा है कि अमेरिका की, र्इंधन के लिए भविष्य में, ओपेक देशों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। इस प्रकार शेल आॅयल को कच्चे तेल के विकल्प के रूप में भी देखा जाने लगा है, परंतु इसका उत्पादन अभी महंगा है। यही वजह है कि ओपेक देश अपनी हिस्सेदारी बचाने के लिए उत्पादन में कोई बदलाव किए बिना कीमत को गिरने दे रहे हैं। कुछ भी हो, बदली हुई वैश्विक परिस्थितियां भारत के लिहाज से काफी अच्छी हैं।

दरअसल, भारत दुनिया का चौथा सर्वाधिक आॅयल उपभोक्ता देश है। हम अपनी जरूरतों का करीब 80 फीसदी कच्चा तेल आयात करते हैं, जिसके लिए भारी मात्रा में रकम चुकानी पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतों में गिरावट का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। इसका मतलब है कि इस मद में अब कम विदेशी मुद्रा खर्च करनी होगी। जिससे चालू खाते के घाटे में कमी आएगी। कच्चे तेल की कीमत में कमी आने से पिछले छह महीनों में सरकारी तेल कंपनियां कई बार पेट्रोल व डीजल के दाम घटा चुकी हैं। अब आगे भी इसकी गुंजाइश बढ़ गई है। तेल की कीमत कम होने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ कम होगा जिससे वित्तीय घाटे में कमी आएगी। इससे सरकार को मुद्रास्फीति पर भी काबू पाने में सहायता मिलेगी। इस प्रकार एक साथ इन सब मानकों के दुरुस्त होने से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

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