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आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बना नक्सलवाद!

नक्सलवादी एक भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के अस्तित्व के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।

आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बना नक्सलवाद!
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सली हमले में चौदह जवानों की शहादत चिंता की बात है। जिले में दस दिन के अंदर यह दूसरा नक्सली हमला है। 21 नवंबर को भी यहां वायुसेना के हेलीकॉप्टर पर गोलियां दागी गई थीं। यहां गत वर्ष मई में एक नक्सली हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं सहित 28 लोग मारे गए थे। इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ में नक्सली अपने दुस्साहस का प्रदर्शन कई बार खून बहाकर कर चुके हैं। जिस तरह आए दिन नक्सलवादी बड़ी-बड़ी हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने और सुरक्षा बलों को निशाना बनाने में सफल हो रहे हैं उससे साफ है कि वे अभी भी ताकतवर बने हुए हैं और उनका दुस्साहस कम नहीं हुआ है। यह हमला नक्सलियों की बौखलाहट का नतीजा भी हो सकता है क्योंकि इन दिनों सुरक्षा बलों द्वारा उनपर चौतरफा दबाव बनाया गया है। केंद्र की मोदी सरकार भी नक्सलियों से लड़ाई को अंजाम देने के लिए सख्त व विकासवादी नीति अपनाई हुई है, जिसकी वजह से भारी मात्रा में नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं।
इसके साथ ही नक्सल प्रभावित झारखंड में हो रहे विधानसभा चुनावों में आदिवासी मतदाता बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इस सब कारणों से नक्सली हताश और निराश हैं। आज भारत में लोकतंत्र फलफूल रहा है। विश्व के अन्य देश भी बंदूक छोड़ लोकतंत्र को अपना रहे हैं, लेकिन नक्सली अभी भी इसी मुगालते में हैं कि वे हिंसा के जरिए भारतीय राष्ट्र राज्य को झुकाने में सफल हो जाएंगे। वहीं जो लोग सुरक्षाबलों की कार्रवाई पर कथित मानवाधिकार के नाम पर हल्ला मचाते हैं और देश के ऐसे बुद्धिजीवी जो नक्सलवाद को सामाजिक-आर्थिक समस्या मान इससे हमदर्दी जताते हैं, उन्हें भी विचार करना चाहिए।
यह सही है कि नक्सलवाद की शुरुआत एक आंदोलन के रूप में हुई थी, लेकिन अब यह अपने मकसद से भटक गया लगता है। इसमें अब उन तमाम बुराइयों का समावेश हो गया है जो एक भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के अस्तित्व के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। दरअसल, नक्सलवादी भारतीय संविधान, न्यायव्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नहीं मानते हैं। लिहाजा, अब गरीब और वंचित तबके के हितों की रक्षा के नाम पर वे एक प्रकार के गिरोह का रूप ले चुके हैं।
नक्सली आदिवासी इलाकों में विकास कार्यों में बाधा खड़ा कर रहे हैं, इससे स्पष्ट है कि उनको आदिवासियों की कोई परवाह नहीं है। आज नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाने लगा है। वे देश के दुश्मन की तरह व्यवहार करते प्रतीत हो रहे हैं। लिहाजा नरमी छोड़ कड़ी कार्रवाई का वक्त आ गया है। मोदी सरकार साफ कर चुकी है कि सरकार उनसे सख्ती से निपटेगी। इसके साथ ही जो इलाके विकास की धारा से अछूते रह गए हैं, वहां विकास कार्यों में और तेजी लाई जा रही है।
हालांकि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़ें और उनका लाभ अंतिम व्यक्ति को जरूर मिले। सुरक्षा बलों के मनोबल को बनाए रखने के लिए भी यह जरूरी है। नक्सलियों को भी हिंसा छोड़ बातचीत के जरिए समस्याओं के समाधान खोजने के प्रयास करने चाहिए। हिंसा से किसी का भी भला नहीं होगा। नक्सलियों को अब यह बात समझ लेनी चाहिए।
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