Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

मानसून के कमजोर रहने के अनुमान ने बढ़ाई चिंता

देश की कृषि नीति सिंचाई सुविधाओं के मामले में एक दम हाशिए पर खड़ी रही है।

मानसून के कमजोर रहने के अनुमान ने बढ़ाई चिंता
मौसम विभाग ने इस साल देश में मानसून के कमजोर रहने का अनुमान लगाया है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि जून से सितंबर के दौरान सामान्य से कम बारिश होगी। इस साल बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से किसान पहले से ही बेहाल हैं, ऊपर से यदि मानसून कमजोर रहेगा तो देश को कईस्तरों पर संकट का सामना करना पड़ेगा। यह विडंबना ही है कि भारतीय कृषि और मानसून के बीच एक गैरजरूरी रिश्ता बन गया है। मानसून यदि थोड़ा-सा भी कमजोर होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था कांपने लगती है।
हमारी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है और कम वर्षा के कारण पैदा हुए सूखे से कृषि सेक्टर में बदहाली आती है जो अर्थव्यवस्था के सभी सेक्टर की सेहत बिगाड़ देती है। कृषि अर्थव्यवस्था की बदहाली का सीधा प्रभाव देश की करीब 65 फीसदी आबादी पर पड़ेगा, क्योंकि देश में इतने लोग अभी भी खेती पर निर्भर हैं। दूसरी ओर उद्योग जगत भी इसकी मार से बच नहीं पाएगा, क्योंकि उसको कच्चा माल कृषि से ही मिलता है। यदि मानसून के दौरान बारिश कम होती है तो सूखे जैसे हालात बनेंगे। ऐसे में महंगाई बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
बेहतर होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें अभी से सूखे की हालत से निपटने के लिए कारगर बंदोबस्त कर लें। देश में 60 प्रतिशत से अधिक खेती बारिश पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में भारतीय किसानों पर इसकी मार पड़नी तय है। ऐसा होने पर खाद्यान्न के उत्पादन में कमी आएगी, कृषि-उत्पाद के दाम बढ़ेंगे। बड़ी ग्रामीण आबादी की क्रयक्षमता प्रभावित होगी। परिणामस्वरूप गरीबी के दुष्चक्र में फंसे सैकड़ों गांवों को बदहाली के दलदल में जीने को मजबूर होना पड़ेगा।
तथ्य बताते हैं कि देश की कुल गरीब आबादी का 69 फीसदी हिस्सा सिंचाई सुविधा से वंचित क्षेत्रों में रहता है, जबकि सिंचाई की सुविधा से संपन्न क्षेत्रों में गरीबों की संख्या महज दो फीसदी है। पिछली बार ऐसी ही कुछ स्थिति आई थी जिससे निपटने के लिए मोदी सरकार ने आकस्मिक योजना बनाई थी। अब देखना है कि सरकार इस आने वाली चुनौती से किस तरह निपटती है। देश में अल नीनो की सक्रियता से मानसून के प्रभावित होने की घटना नई नहीं है।
बहरहाल, कृषि का बारिश का मोहताज होना ही सबसे बड़ी समस्या है। यानी भारतीय कृषि के साथ समस्या यह है कि हर खेत तक सिंचाईकी सुविधा का अभाव है। इसी वजह से कम बारिश से खेती प्रभावित हो जाती है। 2009 में भी तीन दशक का सबसे जबरदस्त सूखा पड़ा था तो उस साल दिसंबर में महंगाई की दर 20 फीसदी तक पहुंच गई थी। इस बार पहले से एलर्ट रहने से उम्मीद है कि वैसे हालात पैदा ना हों। आज सबसे पहली प्राथमिकता देश में एक ऐसी सिंचाई नीति विकसित करने की होनी चाहिए जिससे भारतीय कृषि को मानसून के आगे लाचार नहीं रहना पड़े।
देश की कृषि नीति सिंचाई सुविधाओं के मामले में एक दम हाशिए पर खड़ी रही है। हालांकि मोदी सरकार इस समस्या के स्थाई निदान के लिए प्रधानमंत्री सिंचाई योजना पर गंभीरता से काम कर रही है। इसका मकसद हर खेत तक पानी पहुंचाना है। वहीं दीर्घकालिक उपाय के रूप में वह नदियों को जोड़ेगी ताकि जल संसाधनों का सर्वोत्कृष्ट उपयोग हो सके और बार-बार बाढ़ व सूखे का खतरा टाला जा सके।
Next Story
Top