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किसानों के हित में भूमि अधिग्रहण पर जोर

वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-दो सरकार ने जल्दबाजी में भूमि अधिग्रहण अधिनियम बनाई।

किसानों के हित में भूमि अधिग्रहण पर जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में बेमौसम बारिश से बरबाद हुई फसलों का और किसानों के दैनिक जीवन तथा खेती से जुड़ी परेशानियों का जिक्र किया, लेकिन ज्यादातर हिस्सा भूमि अधिग्रहण बिल पर ही केंद्रित रखा, तो इसकी वजह भी है।

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दरअसल, देश में कांग्रेस की सरकारें अंग्रेजों के जमाने में 1894 में जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम बना उसी के तहत करीब एक सौ बीस साल तक भूमि अधिग्रहित करती रहीं। वर्ष 2013 में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-दो सरकार ने जल्दबाजी में भूमि अधिग्रहण अधिनियम बनाई। हालांकि समय के साथ उस कानून में कईतरह की खामियां सामने आर्इं हैं। इस बिल के पारित होने के बाद कोई भी राज्य सरकार भूमि अधिग्रहण करने में सफल सिद्ध नहीं हुई, क्योंकि इसमें ऐसे-ऐसे प्रावधान कर दिए गए हैं, जिनके चलते अधिग्रहण आसान नहीं रह गया है। संबंधित लोगों की सहमति प्राप्त करना असंभव-सा कार्य हो गया।

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गत वर्ष सत्ता में आई केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उसके ऐसे प्रावधानों को खत्म करने के साथ ही अन्य खामियों को दूर करने का भी फैसला किया है। वह नया बिल लेकर संसद में आई है। हालांकि विपक्ष के एतराज को देखते हुए उसने लोकसभा में इसे पारित करने से पहले नौ संशोधन भी किए हैं, परंतु कांग्रेस इस जिद पर अड़ी है कि पिछले साल उसने जो विधेयक बनाया था, मौजूदा सरकार भी उसी के साथ काम करे। इसके साथ ही विपक्षी दल खासकर कांग्रेस संसद से सड़क तक इस पर सियासत भी करती प्रतीत हो रही है। एक तरफ वह बिल के प्रति किसानों में कईतरह के भ्रम फैला रही है तो दूसरी तरफ उसे किसान विरोधी बताकर उन्हें डरा भी रही है। अब प्रधानमंत्री मोदी ने बिल के सभी बिंदुओं पर प्रकाश डाला है और विपक्ष द्वारा पेश की जा रही तस्वीर से बिल्कुल अलग खाका देश के किसानों के सामने रखा है। उन्होंने कहा है कि देश में 13 कानून ऐसे हैं, जिसमें सबसे ज्यादा जमीन अधिग्रहण की जाती है, जैसे रेलवे, नेशनल हाईवे, खदान के काम आदि, लेकिन पिछली सरकार के कानून में इनको बाहर रखा गया है। बाहर रखने का मतलब ये है कि इन 13 प्रकार के कामों के लिए जो कि सबसे ज्यादा जमीन ली जाती है, उसमें किसानों को वही मुआवजा मिलेगा, जो अंग्रेजों के बनाए कानून से मिलता था।

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अब उनकी सरकार ने जो बिल लाया है उसमें इन सभी को शामिल किया गया है। भले सरकार को जमीन लेने की जरूरत हो, लेकिन उसका मुआवजा भी किसान को दो अथवा चार गुना तक मिलेगा। शहरीकरण के लिए जो अधिग्रहण होगा उसमें विकसित भूमि का 20 प्रतिशत उस भूमि मालिक को मिलेगी, ताकि उसको आर्थिक रूप से हमेशा लाभ मिले। परिवार के युवक को नौकरी मिलेगी। यदि प्रोजेक्ट तय समय सीमा में पूरा नहीं होगा तो पूरी जमीन वापस हो जाएगी। उन्होंने साफ कर दिया कि निजी उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहण 2013 के कानून के अनुसार ही होगा। यानी बिना किसानों की सहमति के जमीन नहीं ली जाएगी। साथ ही जमीन मालिक न्याय के लिए कोर्ट भी जा सकते हैं।

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पीपीपी मॉडल पर कहा कि इसके जरिए निजी कंपनियां सरकार के लिए सड़कें व मकान आदि बनाएंगी। वहीं औद्योगिक कॉरिडोर ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाएंगे जिस पर सरकार का अधिकार होगा, जिससे ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा। प्रधानमंत्री का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी है। इसके बिना वे उन घोषणाओं को जमीन पर नहीं उतार सकते, जो उन्होंने की हैं। बहरहाल, कांग्रेस और दूसरे दलों को विरोध के लिए विरोध का रास्ता छोड़ आम सहमति से एक बेहतर कानून बनाने में सरकार का साथ देना चाहिए।

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