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मणिपुर में उग्रवादियों की कायराना हरकत निंदनीय

मणिपुर के चंदेल जिले में उग्रवादियों ने सेना के काफिले पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें 20 जवान शहीद हो गए।

मणिपुर में उग्रवादियों की कायराना हरकत निंदनीय

पिछले कुछ वर्षों से करीब-करीब शांत चल रहे पूर्वोत्तर में उग्रवादियों ने फिर कायराना हरकत की है। मणिपुर के चंदेल जिले में उग्रवादियों ने सेना के काफिले पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें 20 जवान शहीद हो गए। 11 जवान घायल हो गए। पांच उग्रवादी भी मारे गए। हाल के वर्षों में सेना के इतने जवानों के शहीद होने की यह सबसे बड़ी घटना है। हमला एक शक्तिशाली इम्प्रोवाइज्ड एक्सपलोसिव डिवाइस (आईईडी) से किया गया है। इससे साफ है उग्रवादियों ने सुनियोजित हमला किया है। हालांकि अभी तक किसी भी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन मणिपुर में पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) और कांगली यावोल कन्ना लूप (केवाईकेएल) जैसे उग्रवादी संगठन 1990 के दशक से सक्रिय हैं। मणिपुर के गृहसचिव जे सुरेश बाबू ने 'पीएलए' पर संदेह जताया है। मणिपुर के चंदेल जिले के जिस क्षेत्र में उग्रवादियों ने यह हमला किया है, वह इलाका सेना के ऑपरेशन के लिए आसान नहीं है, क्योंकि यह पहाड़ी क्षेत्र है और इसके चारों ओर घने जंगल हैं।

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बुधवार को ही असम राइफल्स की टुकड़ी द्वारा कथित तौर पर एक महिला की हत्या के विरोध में चंदेल में बंद का ऐलान किया गया था। उसके बाद सेना का ऑपरेशन लगता है उग्रवादियों को नागवार गुजरा है। इस हमले को जिस भी उग्रवादी गुट ने अंजाम दिया हो, लेकिन यह सही है कि पिछले करीब 10 वर्षों में सरकारी और सैन्य प्रयासों से पूर्वोत्तर में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगा है। पूर्वोत्तर में सक्रिय कई उग्रवादी संगठनों की कमर टूटी है, कुछेक का तो वजूद ही खत्म हो गया है। 1950 के दशक में सबसे पहले नागालैंड में उग्रवाद ने स्वशासन और समाजवाद के नाम पर सिर उठाया था। वहां नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-इसाक-मुइवा (एनएससीएन-आईएम) ने वर्षों सशस्त्र हिंसा की। 1990 के दशक में भारत सरकार से इसाक-मुइवा गुट के वार्ता के बाद नगालैंड में उग्रवादी गतिविधियां थम गईं। खापलांग गुट का प्रभाव भी सीमित हो गया।

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1980 के दशक में स्वायत्तता और बोडोलैंड की मांग के साथ असम उग्रवाद की चपेट में आया। 1971 में गठित यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) ने अलग असम की मांग को लेकर हिंसक संघर्ष शुरू किया। उल्फा में विभाजन के बाद अरविंद राजखोवा गुट और परेश बरुवा गुट की ताकत करीब-करीब खत्म हो गई। असम में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडोलैंड के संगबिजित के अलग-थलग पड़ जाने से यह गुट भी प्रभावहीन है। त्रिपुरा में भी उग्रवादी संगठन बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं है। मिजोरम में भी मिजो नेशनल फ्रंट की ताकत खत्म हो गई है। सबसे बड़ी चिंता मणिपुर को लेकर है। यहां पर उग्रवादी संगठनों की सक्रियता जारी है। कुछ वर्ष पहले पूर्वोत्तर में सात उग्रवादी गुटों ने साझा मंच बनाया था। खुफिया एजेंसी को शक था इसके पीछे चीन का हाथ था। मणिपुर में ताजा हमला दर्शाता है कि उग्रवादी अपनी वजूद जिंदा रखने की कोशिश में है। यह निंदनीय है। केंद्र सरकार को चाहिए कि इस तरह के हमला करने वालों को कड़ा सबक सिखाए, ताकि पूर्वोत्तर में बचे-खुचे उग्रवाद भी खत्म हो जाए।

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