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स्वास्थ्य सेवा को सस्ता व सुलभ बनाने की चुनौती

राइट टु एजुकेशन एक्ट की तरह राइट टु हेल्थ एक्ट का सुझाव दिया गया है।

स्वास्थ्य सेवा को सस्ता व सुलभ बनाने की चुनौती

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने नई स्वास्थ्य नीति-2015 का मसौदा जारी किया है। जिसमें सेहत का संवैधानिक अधिकार देने की बात कही गई है। अर्थात इस मसौदे में राइट टु एजुकेशन एक्ट की तरह राइट टु हेल्थ एक्ट का सुझाव दिया गया है। इसका मतलब हुआ कि किसी नागरिक से यह अधिकार छीनने पर दंड का प्रावधान होगा। अब लोगों से मिले सुझावों के आधार पर देश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए नई स्वास्थ्य नीति बनेगी, जो 2002 की स्वास्थ्य नीति का स्थान लेगी। कई औद्योगिक देशों में इस तरह के कानून हैं जो वहां के नागरिकों को स्वास्थ्य का अधिकार देते हैं।

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वहीं कई विकासशील देशों जैसे ब्राजील और थाईलैंड ने भी इस तरह के प्रावधान कर रखा है जिससे वहां के लोगों को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज की सुविधा मिलती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत कई ऐसे सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर कर चुका है जिसमें कहा गया है कि स्वास्थ्य का अधिकार देने के लिए कानून बनने चाहिए। देश में अदालतें भी अपनी टिप्पणियों और फैसलों में यह बात कहती रही हैं कि स्वास्थ्य सेवा किसी नागरिक का मौलिक अधिकार है, क्योंकि संविधान हर नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। आज देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की सबसे ज्यादा जरूरत है। प्रति व्यक्ति डॉक्टरों की उपलब्धता, अस्पताल में बिस्तरों की उपलब्धता, धन की कमी और व्यवस्था में व्याप्त खामियों के कारण स्वास्थ्य के मोर्चे पर हमारा प्रदर्शन बेहतर नहीं है।

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केवल विकसित देशों की तुलना में ही नहीं, विकासशील देशों की तुलना में भी हमारे देश में स्वास्थ्य संबंधित मूलभूत संरचना और संसाधनों की कमी है। कई विशेषज्ञों ने माना है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च कम से कम जीडीपी का तीन फीसदी जरूर होना चाहिए। फिलवक्त भारत में सार्वजनिक तौर पर जीडीपी का करीब एक फीसदी ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाता है। इसमें से 63 फीसदी हिस्सा मजदूरी और वेतन देने में ही चला जाता है। इसके बाद कम ही पैसा दवा, उपकरण और मूलभूत संरचना के लिए बच पाता है। जबकि देश की आधी आबादी गरीबी में जीवन-यापन कर रही है। उसकी निजी अस्पतालों तक पहुंच नहीं है। जाहिर है, भारत का एक बहुत बड़ा तबका ऐसा है जिसकी जिंदगी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर करती है।

आज पुराने रोगों के साथ नई-नई जानलेवा बीमारियां चुनौती पेश कर रही हैं। वहीं अन्य देशों की अपेक्षा महिलाओं और बच्चों की मृत्यु दर भी काफी अधिक है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना होगा कि हर किसी को सस्ता, सुलभ और आसानी से इलाज मिल सके। यह विडंबना है कि आज देश में इलाज इस कदर महंगा हो गया है कि एक बड़ी आबादी स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च के बोझ के कारण गरीबी रेखा से नीचे पहुंच जाती है। जाहिर है, स्वास्थ्य के मोर्चे पर स्थिति चिंताजनक है। इलाज में कमी से वे असमय कालग्रस्त हो रहे हैं। कहा गया है कि स्वास्थ्य ही धन है। यदि देश के नागरिक स्वस्थ होंगे तभी वे देश के विकास में भागीदार बन सकेंगे। ऐसे में सरकार को नई स्वास्थ्य नीति पर गंभीरता से सोचना चाहिए।

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