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चिंतन: असली गांधी के वंशजों के पास अपना घर नहीं!

गांधी जी के नाम पर राजनीति करने और राजनीतिक लाभ अजिर्त करने वाले गांधी के वंशजों की खैर-खबर रखना तक जरूरी नहीं समझते हैं।

चिंतन: असली गांधी के वंशजों के पास अपना घर नहीं!
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यह सूचना चौकाने वाली है और दु:खद भी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पौत्र कनु गांधी और उनकी धर्मपत्नी डा. शिवा लक्ष्मी गांधी का अमेरिका से लौटने के बाद कोई पता ठिकाना नहीं है और अभावों से जूझते हुए उन्हें एक वृद्ध आश्रम की शरण लेनी पड़ी है। 87 साल के कनु भाई गांधी महात्मा गांधी के तीसरे बेटे रामदास गांधी के बेटे हैं।

इस घटना के बारे में यह सही टिप्पणी है कि इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज के दौर के गांधी बड़े-बड़े सरकारी बंगलों में रहते हैं और हर तरह की सुख सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं जबकि असली गांधी के वंशजों के पास रहने के लिए सिर्फ वृद्ध आश्रम ही बचा है। देखा जाए तो यह बात सही है कि आज के गांधी वो नहीं हैं, जिन्होंने अपनी सकारात्मक जिद और अहिंसा के मार्ग को अपनाते हुए भारत को आजादी दिलाई हो बल्कि आज के ये गांधी सत्ता का केंद्र बने रहना चाहते हैं। कोई और सत्ता में आ जाए, यह इन्हें बर्दाश्त नहीं।

यह अपने आप में कम आश्चर्य की विषय नहीं है कि गांधी जी के नाम पर राजनीति करने और राजनीतिक लाभ अजिर्त करने वाले गांधी के वंशजों की खैर-खबर रखना तक जरूरी नहीं समझते हैं। गांधी खुद भी सिद्धांतवादी थे। अपने विचारों से समझौता उन्हें स्वीकार नहीं था और उनके वंशज भी इस मामले में बहुत हद तक उनके दिखाए मार्ग पर अग्रसर हैं। यह अपने आप में हैरत की बात है कि जो कनु गांधी अपनी धर्मपत्नी के साथ वृद्ध आश्रम में आश्रम लेने को मजबूर हुए हैं, वह 40 साल तक अमेरिका में रहे हैं। वह 2014 में भारत लौट आए थे, लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर दोनों पति-पत्नी अकेले पड़ गए हैं।

दोनों की कोई संतान नहीं है। भारत में कोई घर नहीं है, इसलिए दिल्ली में वृद्ध आर्शम का सहारा लेना पड़ा। कनुभाई ने न केवल अमेरिका के मशहूर एमआईटी में पढ़ाई की है, वरन वहां नासा से जुड़े रक्षा विभाग में कार्य भी कर चुके हैं। बताते हैं कि गांधीजी की हत्या के बाद उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजा था। उन्होंने उस वक्त गांधी के वंशजों की चिंता की थी, परन्तु साठ-पैंसठ साल की अवधि बीतने के बाद अब नेहरू के परिजनों को उम्रदराज कनु गांधी और उनकी पत्नी की कोई चिंता नहीं है।

कनु गांधी की पत्नी डा. शिवा लक्ष्मी गांधी बायोकैमिस्ट्री में पीएचडी हैं और बोस्टन में अध्यापन कार्य करती थी। वैसे यह अपने आप में रहस्य की बात है कि इतने अच्छे पदों पर काम करने के बावजूद वे अभावग्रस्त जिंदगी जीने को मजबूर क्यों हैं? क्या रिटायर होने के बाद जीवन पर्यन्त पेंशन मिलने की व्यवस्था अमेरिका में नहीं है? बहरहाल, जैसे ही इनकी बदहाली की खबर मीडिया के जरिए लोगों को लगी, वैसे ही उनकी तरफ बहुत से मदद के हाथ बढ़े हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें जरूरी सुविधाएं देने का भरोसा दिया है। हालांकि कनु गांधी ने खुद स्वीकार किया है कि कुछ अरसा पहले जब वे एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी से मिले थे, तब भी उन्होंने कहा था कि जब उन्हें किसी तरह की जरूरत महसूस हो, बेहिचक उनसे कह सकते हैं, परन्तु संकोची कनु गांधी का कहना है कि वे मदद के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने में भरोसा नहीं करते। इसी संकोच के चलते वह प्रधानमंत्री के पास नहीं गए। इस घटना ने बहुतों को दु:खी किया है।

साथ ही उस तस्वीर को भी उजागर किया है कि जिन बुजुर्ग दंपत्तियों या व्यक्तियों के कोई औलाद नहीं है या जिनके पास घर और व्यवस्थाएं नहीं हैं, उन्हें किस तरह की जिंदगी बिताने को मजबूर होना पड़ रहा है। कनु और लक्ष्मी गांधीजी के वंशज हैं, इसलिए उन्हें मदद मिल गई है परन्तु जो किसी जानी-मानी हस्ती के वंशज नहीं हैं, उनकी ओर मदद का हाथ कौन बढ़ाएगा? क्या सरकारों को उनके बारे में नहीं सोचना चाहिए?

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