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भारतीय राजनीति को नई दिशा मिलने की उम्मीद

महाराष्ट्र में जहां भाजपा और शिवसेना 25 वर्षों का साथ छोड़कर अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं

भारतीय राजनीति को नई दिशा मिलने की उम्मीद
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नई दिल्ली. महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों के नतीजों से साफ हो गया है कि जनता नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा के साथ है। हरियाणा में पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है जबकि महाराष्ट्र में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। भाजपा ने विकास और सुशासन के मुद्दे पर जनादेश मांगा था। नतीजों से स्पष्ट हैकि जनता कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार, कुशासन, भेदभाव, वंशवाद व जातिवाद की राजनीति से अब ऊब चुकी है। वह ऐसी राजनीति चाहती है जिससे विकास हो सके, रोजगार मिल सके, सुशासन आ सके। वह ऐसी सरकार चाहती है जिसमें पारदर्शिता हो और जो जनता के प्रति जवाबदेह हो। निश्चित रूप से हरियाणा और महाराष्ट्र की जनता ने इसके लिए भाजपा के नेतृत्व को उपयुक्त माना है। दोनों राज्यों में चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प हो गयाथा।
महाराष्ट्र में जहां भाजपा और शिवसेना 25 वर्षों का साथ छोड़कर अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं, वहीं कांग्रेस और एनसीपी का भी 15 वर्षों का गठबंधन टूट गया था। मनसे के आने से मुकाबला पांचकोणीय हो गयाथा। वहीं हरियाणा में भी कोई भी गठबंधन नहीं था। चुनाव परिणाम से यह साफ हैकि देश में अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा बरकरार है। दरअसल, दोनों राज्यों में भाजपा का प्रमुख चेहरा वही थे। अब हरियाणा और महाराष्ट्र में जीत के बाद पार्टी और देश में उनकी लोकप्रियता तथा स्वीकार्यता और बढ़ेगी। इस जनादेश के बाद उन आलोचकों को भी जवाब मिल गया हैजो गत दिनों उपचुनावों के नतीजों के आधार पर मान रहे थे कि मोदी लहर समाप्त हो गई है।
लोकसभा चुनावों के बाद यह पहला चुनाव था। कई लोग इसे मोदी सरकार के कामकाज के प्रति जनमत सर्वेक्षण से भी जोड़कर देख रहे थे। उस लिहाज से भी यह जीत सरकार के प्रदर्शन पर मुहर लगाती है। यह जीत मोदी सरकार का आत्मविश्वास बढ़ाने वाली साबित होगी। भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह के नेतृत्व में भी यह पहला चुनाव था। दोनों राज्यों में पार्टी को मजबूती दिलाकर उन्होंने अपनी रणनीतिक क्षमता को साबित किया है। आने वाले दिनों में झारखंड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने हैं। यह जीत पार्टी को नई ऊर्जादेगी। ये चुनाव राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के लिए भी एक सबक की तरह है। हरियाणा और महाराष्ट्र में उसकी जो दुर्दशा हुई उसके बाद उसे अपनी रणनीति पर दोबारा सोचने की जरूरत है।
दोनों राज्यों में वह तीसरे नंबर पर पहुंच गई है। एक तरह से वह कहीं लड़ाई में ही नहीं थी। यही सही है कि महाराष्टÑ में वह 15 साल से और हरियाणा में वह 10 साल से सत्ता में थी और ऐसे में उसके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी एक फैक्टर था, लेकिन यह भी साफ है कि उसने जनता के हितों को नजरअंदाज किया। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इन चुनावों से भी एक हद तक दूर रहा, मानो उसे अपनी हार चुनाव से पूर्व ही दिख गई थी।
सारा दारोमदार भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पृथ्वीराज चव्हाण पर था। बुनियादी रूप से आज कांग्रेस में नेतृत्व का संकट स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। साथ ही पार्टी में लोकतंत्र का भी साफ अभाव है। परिवारवाद व हाईकमान कल्चर पार्टी में नए नेतृत्व के उभर में बाधक बनी हुई है। क्या इन नतीजों से कांग्रेस सबक लेगी? बड़ा प्रश्न है।
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