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ऐसे दावे से पहले जमीनी हकीकत को भी समझें

भ्रष्टाचार से त्रस्त मतदाता ऐसा नेतृत्व चाहते हैं जो निर्णायक और प्रेरणादायक हो।

ऐसे दावे से पहले जमीनी हकीकत को भी समझें
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नई दिल्ली. चुनावों के दिनों में आमतौर पर यह देखा जाता है कि विभिन्न पार्टियों में टिकट पाने के लिए संभावित उम्मीदवारों में होड़ मची रहती है। निश्चित रूप से इसे चुनाव में संबंधित पार्टी की संभावनाओं से जोड़ कर देखा जाता रहा है। मौजूदा दौर में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी में आम चुनावों के मद्देनजर संभावित उम्मीदवारों में टिकट पाने या क्षेत्रीय दलों में उससे गठबंधन बनाने की बहुत ज्यादा होड़ नहीं दिखाई दे रही है! शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र सामना में कहा है कि कांग्रेस के नेता किसी न किसी वजह से हार को सामने देख चुनावों से दूर रहना चाहते हैं। तो क्या इसका यह निष्कर्ष निकाला जाए कि इस बार सत्ता से बाहर होने की भनक उन्हें मिल चुकी है।
हालांकि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा है कि यूपीए 16वीं लोकसभा में 2009 से भी ज्यादा सीटें जीतेगी परंतु वर्तमान माहौल में इसकी संभावना कम ही दिखाई दे रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में केद्र की सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ एक लहर चल रही है। यह किसके पक्ष में जाएगी इसका एक अनुमान भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैलियों में जुट रही भीड़ को देख लगा सकते हैं। वहीं हाल में जितने भी सर्वेक्षण आए हैं सभी में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी मतदाताओं की पहली पसंद रहे हैं। हालांकि दावे से कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस के खिलाफ बने माहौल की स्वीकारोक्ति खुद कांग्रेसी ही समय समय पर करते रहे हैं।
सांसद मणिशंकर अय्यर कह चुके हैं कि पार्टी को 2014 में विपक्ष में बैठने की तैयारी कर लेनी चाहिए। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता पीसी चाको ने भी माना हैकि कि मौजूदा माहौल पार्टी के प्रतिकूल है। इस प्रतिकूल माहौल के लिए उन्होंने केवल प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहरा दिया है। हालांकि यह पूरा सच नहीं है। इसके लिए पूरी यूपीए जिम्मेदार है, क्योंकि वह जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाई है। यह सही है कि प्रधानमंत्री फैसले लेने में नरम रुख अपनाते रहे और विभिन्न विवादास्पद मुद्दों पर अपना पक्ष रखने में एक हद तक कंजूसी बरते, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि इसके लिए किसी न किसी स्तर पर कांग्रेस नेतृत्व ही जिम्मेदार है। प्रधानमंत्री को निर्णय लेने की छूट नहीं दी गई। और तो और खुद राहुल गांधी ने भी माना है कि सरकार के खिलाफ लोगों में माहौल है, इसके बावजूद भी उनका जीत का दावा करना हास्यास्पद है।
चुनावों से पूर्व कराए गए तमाम ओपिनियन पोल में कहा गया है कि कांग्रेस इस बार अपनी ऐतिहासिक हार की ओर बढ़ रही है। इससे पहले भाजपा के अरुण जेटली कांग्रेस को एक डूबता हुआ जहाज कह ही चुके हैं। यदि राहुल गांधी अपने कार्यकर्ताओं के मनोबल को ऊंचा बनाए रखने के लिए ऐसा दावा कर रहे हैं तो समझा जा सकता है पर यदि वे सचमुच यह दावा कर रहे हैं तो साफ है वह पूरी तरह से वास्तविकता से कटे हैं। महंगाई, गिरती अर्थव्यवस्था और भ्रष्टाचार से त्रस्त मतदाता ऐसा नेतृत्व चाहते हैं जो निर्णायक और प्रेरणादायक हो। जो देश को विकास के पथ पर आगे ले जा सके। जाहिर है कि कांग्रेस और उसका नेतृत्व इस एजेंडे में फिट नहीं बैठ रहा है।
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