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कदाचारमुक्त परीक्षाएं कराने की चुनौती

हरियाणा के रोहतक में पुलिस को पता चला कि एआईपीएमटी परीक्षा की आंसर-की लीक हो गई है।

कदाचारमुक्त परीक्षाएं कराने की चुनौती
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सीबीएसई द्वारा आयोजित ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट यानी एआईपीएमटी की परीक्षा संदेह के घेरे में आ जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इसे रद करने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं बच गया था। कोर्ट के आदेशानुसार अब सीबीएसई को चार हफ्तों के भीतर दोबारा यह परीक्षा संपन्न करानी होगी। दरअसल, गत महीने देश भर में यह परीक्षा आयोजित हुई थी, जिसमें लाखों छात्र शामिल हुए थे। उसी दिन हरियाणा के रोहतक में पुलिस को पता चला कि इस परीक्षा की आंसर-की लीक हो गई है। बाद में गहन जांच पड़ताल करने पर इसमें बड़े पैमाने पर देशव्यापी कदाचार की बात सामने आई। कदाचारियों ने नकल के लिए हर तरह के आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया था। वहीं ऐसी परीक्षाओं में नकल के जरिए प्रवेश सुनिश्चित कराने वाला एक बड़ा गिरोह भी पुलिस की पकड़ में आया है। हालांकि इसका मास्टर माइंड अभी भी पुलिस की गिरफ्त से दूर है। उम्मीद है, वह भी जल्द पकड़ में आ जाएगा। कदाचार की बातें सामने आने के बाद कई छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर परीक्षा रद करने की गुहार लगाई थी।

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हरियाणा पुलिस की जांच के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने भी पाया है कि परीक्षा में धांधली हुई है। शुरुआत में सीबीएसई परीक्षा रद करने के पक्ष में नहीं थी। उसे तो यह भी पता नहीं था कि आंसर-की लीक हुई है। यह विडंबना ही है कि जिस संस्था के कंधों पर पारदर्शी तरीके से परीक्षा संपन्न कराने की जिम्मेदारी है, वही छात्रों के हितों की अनदेखी कर रही थी। बहरहाल, यह फैसला उन छात्रों के लिए राहतकारी होगा जो अपनी मेहनत और लगन के जरिए आगे बढ़ने की चाह रखते हैं। इस परीक्षा में सीटों की संख्या सिर्फ साढ़े तीन हजार ही है, जबकि परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या छह लाख से ऊपर है। यहां प्रत्येक सीट के लिए कितना कड़ा मुकाबला है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में यदि एक सीट भी कदाचार की भेंट चढ़ जाती तो हजारों छात्रों के साथ कितना बड़ा अन्याय होता, इसे समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी है कि यह परीक्षा भविष्य में बनने वाले डॉक्टरों से जुड़ी है, जो जनता के स्वास्थ्य का ध्यान रखेंगे, इस मामले में उनकी योग्यता के साथ समझौता नहीं हो सकता। यह सही है कि ऐसे फैसलों से परीक्षा कराने वालों और परीक्षार्थियों को परेशानी होती और कुछ वक्त भी लगता है, लेकिन परीक्षा की मान्यता, विश्वसनीयता और सही छात्रों के चुनाव के लिए ये कीमत कुछ भी नहीं है। देश में विभिन्न प्रकार की परीक्षाएं आयोजित कराने वाले संस्थानों को चाहिए कि वो इस मामले में सुरक्षित प्रणाली अपनाकर जनता और छात्रों में भरोसा पैदा करें।

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देश में परीक्षाओं में धांधली की घटनाओं में बढ़ोतरी की एक वजह कड़ा कानून का अभाव भी है। पूर्व में सैकड़ों लोगों को पकड़ा गया है, लेकिन उन्हें कड़ा और अनुकरणीय दंड नहीं मिल सका है। यदि ऐसे मुजरिमों को दंड दिया जाता जिससे पूरे देश में संदेश जाता तो ऐसे कामों को दोबारा करने की हिम्मत शायद ही कोई अन्य जुटा पाता, लेकिन अपराधियों में व्यवस्था ऐसा भय नहीं पैदा कर पाई कि ये फिर से ऐसी जुर्रत न करें। कदाचारमुक्त परीक्षा के लिए संबंधित संस्थाओं को परीक्षाओं के पुराने सिस्टम को छोड़कर नए तरीके अपनाने चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी का जिस तेजी से विस्तार हो रहा है और कदाचारी जितने चुस्त-दुरुस्त हैं, व्यवस्था को भी उतनी चुस्ती से उसका मुकाबला करना होगा, तभी प्रतिभावान छात्रों को अवसर का उचित लाभ मिल सकेगा।

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