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आतंकवाद के खतरे को कब समझेगा पाकिस्तान

आतंकवाद के खतरे को कब समझेगा पाकिस्तान।

आतंकवाद के खतरे को कब समझेगा पाकिस्तान
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पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले कराची शहर में तीन दिन के अंदर दो आतंकी हमले होना यह साबित करता हैकि आतंकवाद से किसी का भी भला होने वाला नहीं है। पाक को भी अब यह समझ लेना चाहिए और दुनिया से आतंकवाद का समूल नाश करने के लिए आगे आना चाहिए। उसे उसका पोषक बनने की बजाय वहां मौजूदा अनुकूल माहौल को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पहले रविवार को कराची के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बड़ा आतंकी हमला हुआ, जिसमें सभी आतंकवादी समेत करीब तीस लोग मारे गए थे। फिर मंगलवार को उसके पास ही स्थित पाकएयरफोर्स सिक्योरिटी फोर्स के ट्रेनिंग कैंप पर करीब पांच आतंकियों ने हमला बोल दिया। इसमें पांच लोगों की मौत हो गई। इस हमले की जिम्मेदारी तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान नामक आतंकी संगठन ने ली है। इससे पाक के उन कट्टरपंथियों की कलई खुल गई है जिन्होंने इस हमले को भारत और केंद्र की नई सरकार के साथ जोड़कर कुप्रचार किया था। पाक में आतंकियों के हौसले कितने बुलंद हैं कि महज कुछ घंटे के अंदर ही उसी क्षेत्र में दोबारा हमला कर दिया। भारत ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा है कि यह हमला आतंकवाद के खतरे के असर को रेखांकित करता है जिससे तत्काल और बड़े स्तर पर लड़ा जाना चाहिए। हमले को देखते हुए भारत ने भी अपने हवाई अड्डों की सुरक्षा कड़ी कर दी है। भारत की ओर से यह चुस्ती जरूरी है क्योंकि देश पाक जनित आतंकवाद का सबसे बड़ा भुक्तभोगी है और पड़ोसी देश से लंबे समय से इस पर लगाम लगाने की मांग करता रहा है परंतु पाक की ओर से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल रहा है। आज पाकिस्तान की छवि आतंकवाद के पोषक की बन गई है जहां आतंकवादियों के फलने-फूलने के अनुकूल माहौल हैं। उस पर यह आरोप लगते हैं कि पूर्व में वहां के हुक्मरानों ने एक खास मकसद के लिए उन्हें खाड़ा किया था पर आज वही आतंकवाद पाकिस्तान की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। आतंकवाद हर तरह से देश-दुनिया के लिए घातक है। इससे विश्व शांति खतरे में पड़ गई है। आज यह सुरक्षा, आर्थिक विकास, गरीबी से उबरने और लोगों को बेहतर जीवनशैली देने के प्रयासों में सबसे बड़ा बाधक है। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि जब तक वह अपनी धरती पर चल रहे आतंकी शिविरों को खत्म कर आतंकी जमातों पर लगाम नहीं लगाता ऐसी घटनाएं नहीं रुकेंगी। आतंकी संगठनों और जमातों को लोकतंत्र में विश्वास नहीं है। वे शांति वार्ता की बजाय बंदूक के बल पर अपनी बात मनवाने में जुटे हैं, पर उन्हें यह भलीभांति याद रखनी होगी कि बंदूक से किसी भी समस्या का न तो समाधान हो सकता है और न ही कुछ हासिल किया जा सकता है। समय आ गया हैजब दुनिया की सभी लोकतांत्रिक ताकतें एकजुट हों। ऐसा होगा तभी वैश्विक स्तर पर फन उठाते आतंकवाद पर काबू पाया जा सकता है और चरमपंथी जमातों के मंसूबों को विफल किया जा सकता है। अन्यथा, यदि मौजूदा स्थिति बरकरार रहती है तो निश्चित रूप से आने वाला समय इससे भी भयंकर साबित हो सकता है।
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