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आरोपी राज्यपाल को हटाने पर बवाल क्यों

मिजोरम की नवनियुक्त राज्यपाल कमला बेनीवाल की बर्खास्तगी को तूल दे कर कांग्रेस खुद ही सवालों के घेरे में आ गई है।

आरोपी राज्यपाल को हटाने पर बवाल क्यों
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मिजोरम की नवनियुक्त राज्यपाल कमला बेनीवाल की बर्खास्तगी को तूल दे कर कांग्रेस खुद ही सवालों के घेरे में आ गई है। यह प्रश्न उठना लाजमी हैकि जब उन पर राजस्थान के भूमि घोटाले में शामिल होने का आरोप था तो कांग्रेस की सरकार ने उनको राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठाया क्यों? बेनीवाल पर आरोप है कि राजस्थान सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने कई एकड़ जमीन खुद को किसान बताकर हासिल कर ली। किसान सामूहिक कृषि सहकारी समिति लिमिटेड को 1953 में कम कीमत पर 20 साल के लिए सरकारी जमीन लीज पर आवंटित की गई थी। लीज अवधि समाप्त होने पर सरकार ने जमीन वापस ले ली। समिति के सदस्य, जिसमें बेनीवाल भी शामिल हैं, इसे भूमि अधिग्रहण बता सरकार से बतौर क्षतिपूर्ति 15 फीसदी विकसित जमीन प्राप्त कर लिए। यह तब हुआ जब बेनीवाल तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार (1998-2003) में राजस्व मंत्री थीं। इसके लिए उन्होंने जो शपथ-पत्र दाखिल किया था उसमें झूठे दावे किये कि वह पिछले 5 दशकों से 14 से 16 घंटे तक खेत में श्रम करती हैं, लिहाजा उन्हें प्लॉट मिलना चाहिए। यह कैसे संभव है कि वह किसान की तरह खेत में श्रम करती होंगी, जबकि वह उस दौरान कई सालों तक कांग्रेस की सरकार में उपमुख्यमंत्री और मंत्री रही थीं। यह मुद्दा सामने आया तब इसे अदालत में चुनौती दी गई, फिर जांच के बाद धोखाधड़ी सामने आई। राष्टÑपति ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर बर्खास्तगी का फैसला लिया। राज्यपाल की नियुक्ति और बर्खास्तगी राष्टÑपति के अधिकार क्षेत्र में है। अब बेनीवाल पर से संवैधानिक सुरक्षा हट गया है। माना जा रहा हैकि अब उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा भी चल सकता है। यही नहीं मिजोरम का राज्यपाल नियुक्त होने के बाद से वहां उन्होंने सिर्फ एक दिन बिताया और ज्यादातर वक्त गृह राज्य राजस्थान में रहीं। गुजरात की राज्यपाल रहते हुए उन्होंने 2011 से 2014 के दौरान निजी कार्यों से प्रदेश सरकार के विमान से 63 बार यात्राएं कीं, जिसमें वे 53 बार जयपुर और सिर्फ 10 बार ही दिल्ली गर्इं। इस तरह देखें तो उनको पद से हटाने के बाद कटघरे में मोदी सरकार नहीं, बल्कि कांग्रेस है। जिसने गंभीर आरोप होने पर भी कमला को गुजरात का राज्यपाल नियुक्ति कर दिया। और अब जब राष्टÑपति ने बर्खास्त कर दिया हैतब इस मामले को राजनीतिक मुद्दा क्यों बना रही है? इस पहलू को परे भी रख दें तो क्या कांग्रेस ने एनडीए के शासनकाल में नियुक्त हुए राज्यपालों को बर्खास्त नहीं किया था? इसका एक उदाहरण विष्णुकांत शास्त्री हैं जिनको कार्यकाल पूरा होने में चार माह पूर्व ही मनमोहन सिंह की सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर राजनीतिक नियुक्तियां एक अलग बहस का मुद्दा है। और हो भी रही है तो राज्यपालों को सरकार बदलते ही इस्तीफा दे देना चाहिए। राज्यपाल रहते हुए कमला बेनीवाल ने गुजारत में टकराव के हालात बनाए रखा। यदि उनको अपने सम्मान की इतनी ही चिंता थी तो मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही पद से हट जाना चाहिए। कांग्रेस सरकार में नियुक्त कई राज्यपाल इस्तीफा नहीं देने पर अड़े हैं। शीला दीक्षित और शिवराज पाटिल के रवैये देख लगता हैकि वे कांग्रेस हाईकमान के इशारे पर काम कर रहे हैं। इससे मोदी सरकार की नहीं बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की छवि खराब हो रही है।
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