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बदलते दौर में भारत-अमेरिका संबंध

जॉन केरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव के दौरान दिए गए नारे सबका साथ-सबका विकास की जिस तरह जमकर तारीफ की।

बदलते दौर में भारत-अमेरिका संबंध
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा दोनों देशों के बदलते रिश्ते की तस्वीर पेश कर रही है। उन्होंने अपनी तीन दिवसीय इस यात्रा के शुरुआत में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव के दौरान दिए गए नारे सबका साथ-सबका विकास की जिस तरह जमकर तारीफ की थी उससे ही साफ हो गया था कि अमेरिका अब और रुकने वाला नहीं है। कुछ वर्षों से जिस तरह से दोनों के संबंधों में ठंडापन आया हैवह उसे गरमाना चाहता है। देश में नई सरकार बनने के बाद किसी अमेरिकी विदेश मंत्री की यह पहली यात्रा थी। जॉन केरी पांचवी वार्षिक रणनीतिक वार्ता की सह अध्यक्षता करने नई दिल्ली आए थे। जिस तरह से वे अपने साथ उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल लेकर आए थे उसी से यह संकेत मिल गए थे कि अमेरिका भारत के साथ दीर्घकालीन सहयोग चाहता है। सरकार बदलने के साथ भारत वैश्विक मंच पर मजबूती के साथ उभरा है। इसके संकेत जॉन केरी का विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ वार्ता से भी स्पष्ट हो गया। सुषमा स्वराज ने जिस तरह राजनीतिज्ञों की जासूसी का मुद्दा उठाया उससे जॉन केरी को बैकफुट पर जाने को विवश होना पड़ा। यही नहीं नरेंद्र मोदी की वीजा मामले पर भी उनको सफाई देनी पड़ी कि यह पूर्व के सरकारों का निर्णय था। विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सरलीकरण समझौता मामले में भी भारत ने दो टूक कह दिया है कि जब तक उसकी चिंताओं का निराकरण नहीं होगा, भारत उस पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। अमेरिका भारत में बड़ा उपभोक्ता बाजार और नई सरकार की विकास के एजेंडे में अपनी कंपनियों के लिए असीम संभावनाएं देख रहा है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि अमेरिका अपने हितों को लेकर बेहद सजग रहता है। दरअसल, इन परिस्थितियों को भारत भी बखूबी पहचानता है। यही वजह है कि जॉन केरी का विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ बृहस्पतिवार को हुई वार्ता में रक्षा, कौशल विकास, आईटी, हेल्थकेयर जैसे मुद्दे छाए रहे। वहीं शुक्रवार को प्रधानमंत्री के साथ हुई उनकी बैठक में द्विपक्षीय व्यापार के अलावा रक्षा सौदा बढ़ाने, आतंकवाद, अफगानिस्तान के मौजूदा हालात, परमाणु ऊर्जा सहयोग और उनकी प्रस्तावित अमेरिकी यात्रा पर चर्चा हुई। वास्तव में दो देशों के संबंधों में एक संतुलन होना चाहिए, जिसमें दोनों देशों के समान हित निहित हों। इस यात्रा से आशा की जा सकती हैकि भारत-अमेरिका संबंधों को एक दिशा मिलेगी और यह रिश्ता अमेरिका के पक्ष में झुके होने की बजाय बराबरी का होगा। यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में असैन्य परमाणु समझौते के ऐलान के समय दोनों देशों का जो रिश्ता परवान चढ़ा था, उसमें पिछले कुछ वर्षों के दौरान एक तरह का धीमापन आ गया था। अब ऐसा लगता है कि नई सरकार के साथ अमेरिका अपने रिश्ते में फिर से गति लाना चाहता है। बहरहाल, सितंबर में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा से पहले अमेरिकी रक्षा मंत्री भी भारत आने वाले हैं। इसके बावजूद अमेरिका और भारत के बीच भारतीय दवा कंपनियों, बौद्धिक संपदा कानून और खाद्य सब्सिडी के मुद्दे पर मतभेद हैं, जिन्हें सुलझाना जरूरी है। क्योंकि ये ऐसे मुद्दे हैं, जिनसे भारत के हित सीधे जुड़े हैं।
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