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जयंती के खुलासे से दखल की बात साबित

यूपीए सरकार में पर्यावरण मंजूरी में काफी मनमानी होती थी।

जयंती के खुलासे से दखल की बात साबित

कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार में पर्यावरण मंत्री रह चुकीं जयंती नटराजन के आरोप बहुत ही गंभीर हैं। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनके दफ्तर की ओर से उनके विभागीय कामकाज में हस्तक्षेप किया जाता था। यानी उनकी ओर से समय-समय पर उन्हें निर्देश मिलते रहते थे। जिसे मानना बाध्यकारी था। जयंती नटराजन ने यहां तक कहा हैकि उन्हें पर्यावरणीय मंजूरी के नाम पर कई प्रोजेक्ट राहुल गांधी के कहने पर रोकने पड़े, जबकी कैबिनेट के सदस्य उनसे मंजूरी की मांग कर रहे थे। यही नहीं कानूनी रूप में उनकी मंजूरी में कोईदिक्कत भी नहीं थी। इससे साफ होता है कि यूपीए सरकार में पर्यावरण मंजूरी में काफी मनमानी होती थी।

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देश की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी पर्यावरण मंजूरी का आधार तय कर रही थी। जिससे दो सौ से ज्यादा प्रोजेक्ट सालों तक लंबित रहे और देश लाखों करोड़ रुपये के निवेश से वंचित रहा। कांग्रेस को इन आरोपों का जवाब देना होगा। वह यह कहकर नहीं बच सकती कि जयंती नटराजन अब ये बात क्यों कह रही हैं। अब यह बात धीरे-धीरे साबित होती जा रही है कि केंद्र की यूपीए सरकार में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी सीधे-सीधे हस्तक्षेप करते थे। कोलगेट हो या 2जी स्पेक्ट्रम आदि घोटाला, देश के सामने यह सच्चाई आ चुकी हैकि किस तरह पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह खामोश रहे और राहुल गांधी व सोनिया गांधी मंत्रियों पर दबाव डालकर मनमानी करते रहे। तब विपक्ष में रही भारतीय जनता पार्टी यह आरोप लगाती रही थी कि कांग्रेस का सरकार में हस्तक्षेप हो रहा है।

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जाहिर है, वे आरोप अब सच साबित हो रहे हैं। यही नहीं डॉ. मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख ने भी अपनी किताबों में इसी तरह के आरोप लगाए हैं। इस तरह की प्रवृत्ति भारत जैसे लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक है कि जो लोग सरकार का हिस्सा नहीं हैं, वे उसके कामकाज में हस्तक्षेप करें। और इस तरह वे किसी के हितों को साधने और किसी के हितों को नुकसान पहुंचाने का काम करें। इससे स्पष्ट हो जाता हैकि कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार अपनी पार्टी का हित साधने के लिए देश और अर्थव्यवस्था के साथ किस तरह खिलवाड़ कर रही थी। यही वजह थी कि उसके शासनकाल में देश की अर्थव्यवस्था गर्त में चली गई। महंगाई बेलगाम हो गई। हमारी विदेश नीति इस कदर लचर हो गई, जिससे छोटे-छोटे पड़ोसी देश तक आंख दिखाने लगे। यही नहीं कई ऐतिहासिक घोटाले सामने आए। देश नीतिगत अपंगता की हालत में पहुंच गया था।

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दरअसल, कांग्रेस के सामने नेतृत्व का संकट है। वह अपने लोगों को एकजुट नहीं रख पा रही है। बड़े और पुराने नेता पार्टी छोड़ रहे हैं। इसके बाद भी वह कोईसीख लेने को तैयार नहीं है। अपने इतिहास में वह पहली बार लोकसभा चुनावों में 44 सीटों पर सिमट गई है। वहीं देश से भी धीरे-धीरे उसका सफाया होता जा रहा है। जहां कभी उसकी सरकार थी, आज वहां वह तीसरे-चौथे स्थान पर पहुंच गई है। जाहिर है, जयंती नटराजन के आरोपों की केंद्र सरकार को जांच करानी चाहिए। देश सच जानना चाहेगा। क्या पता कोई और बड़ा घोटाला सामने आ जाए।

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