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जनता परिवार लड़ाई से पहले ही बिखरा

राजद, जदयू, कांग्रेस और राकांपा को लोकसभा चुनाव में 45 प्रतिशत वोट मिले थे, जो भाजपा से करीब साढ़े पंद्रह प्रतिशत अधिक बैठते हैं।

जनता परिवार लड़ाई से पहले ही बिखरा
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बिहार में जैसी आशंका थी, वैसा ही राजनीतिक घटनाक्रम होता हुआ दिख रहा है। अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है, जब जनता दल यू, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल एस, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मुलायम सिंह यादव की सरपरस्ती में साथ जीने और मरने की कसमें खाई थीं। ये दावे किए थे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को चुनौती देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन कर बाद में इन सभी दलों का विलय कर दिया जाएगा। इसे बिखरे पुराने जनता परिवार की घर वापसी का नाम भी दिया गया था। हालांकि देश में अभी तक गैर भाजपा-गैर कांग्रेस दलों का जब भी कोई तीसरा मोर्चा बना है, उसमें वाम दलों की भी अहम भूमिका रही है परंतु इस बार वाम दलों ही नहीं, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, तेलुगु देशम और कुछ दूसरे महत्वपूर्ण दलों के बिना ही मोर्चा बनाने की कोशिश की गई। तब माना गया कि अभी इन दलों और नेताओं की फौरी तौर पर निगाह बिहार चुनाव पर है, जहां लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की तरह मोदी लहर में भारतीय जनता पार्टी ने सारे सियासी समीकरण ध्वस्त करते हुए चालीस में से बाईस सीटें जीतकर वहां की मुख्य धारा की पार्टियों को ठिकाने लगा दिया था।

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गौर से देखें तो राजद, जदयू, कांग्रेस और राकांपा को लोकसभा चुनाव में 45 प्रतिशत वोट मिले थे, जो भाजपा से करीब साढ़े पंद्रह प्रतिशत अधिक बैठते हैं। और यही सोचकर मुलायम की अगुआई में लालू, नीतीश, देवेगौड़ा और चौटाला के नेतृत्व वाली पार्टियां इकट्ठा हुई थीं। आपको बताते चलें कि यूपी में 80 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से 71 पर भाजपा ने जीत दर्ज की। हरियाणा में 10 सीटें हैं, जिनमें से सात पर भाजपा जीती। बिहार की चालीस में से 22 पर भाजपा ने जीत हासिल की। कर्नाटक से भी भाजपा को अच्छी ताकत हासिल हुई। यूपी में सपा पांच पर सिमट गई। हरियाणा में इनेलो दो पर, बिहार में राजद चार पर और जदयू दो पर सिमट गई। इन सभी को लगा कि एकजुट हुए बिना मोदी लहर को नहीं थामा जा सकता। ये सब एक छतरी के नीचे इकट्ठा जरूर हुए परंतु न नई पार्टी का नाम तय कर पाए और न झंडा व चुनाव चिह्न। विलय टलता रहा क्योंकि बिहार में कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, यही तय नहीं हो पा रहा था। पांच-छह दलों के नेताओं के बीच संवादहीनता और अविश्वास का आलम देखिए कि लालू-नीतीश और कांग्रेस नेताओं ने आपस में बैठकर सीटें बांट ली और जिन मुलायम सिंह यादव को नई पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था, उनसे सलाह तक करना जरूरी नहीं समझा गया। ऐसे में जो होना था, वही हुआ। वीरवार को लखनऊ में बैठक के बाद समाजवादी पार्टी ने तथाकथित गठबंधन तोड़ने और बिहार में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया।

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मुलायम नीतीश और लालू से इस कदर नाराज हैं कि तीन दिन पहले पटना के गांधी मैदान में हुई साझा रैली में भी नहीं गए, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी खासतौर पर आमंत्रित की गई थीं। इस राजनीतिक घटनाक्रम से भारतीय जनता पार्टी और मोदी के रथ को बिहार में रोकने की कोशिशों की हवा निकलती हुई दिखाई देने लगी है। जनता दल यू और राष्ट्रीय जनता दल में अंदरूनी कलह भी शीर्ष पर है। लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ने बिहार के अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलित वोटों में जबरदस्त सेंध लगाई थी, जिसे रोकने के लिए जनता परिवार फिर से इकट्ठा होने की जुगत में था, लेकिन एक बार फिर वही हुआ, जिसके लिए जनता परिवार शुरू से बदनाम है।

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