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घाटी को इस तबाही से उबरने में सालों लगेंगे

अब जब बाढ़ का पानी कम होगा तो समस्या और भी गंभीर होगी, क्योंकि लोगों के पास पर्याप्त खाद्यान्न नहीं होंगे।

घाटी को इस तबाही से उबरने में सालों लगेंगे
जम्मू-कश्मीर करीब छह दशक बाद भयानक बाढ़ की चपेट में है। घाटी को इस तबाही से उबरने में सालों लग जाएंगे। अब तक दौ सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। अधिकारियों के मुताबिक जलजले से अरबों रुपयों की सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ है। हजारों एकड़ खेतों में लगी फसल बर्बाद हो चुकी है। अब जब बाढ़ का पानी कम होगा तो समस्या और भी गंभीर होगी, क्योंकि लोगों के पास पर्याप्त खाद्यान्न नहीं होंगे। यह आपदा ऐसे समय आई है जब साल के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। सभी राजनीतिक दल चुनावों की तैयारियों में लगे हैं। ऐसी कठिन घड़ी में आपसी मतभेदों को भूला कर और एक दूसरे पर लीड लेने की मंशा को परे रखकर सभी को जम्मू-कश्मीर को इस त्रासदी से उबारने के लिए एकजुट होने की जरूरत है। सेना देवदूत बनकर सामने आई है। बचाव कार्य में सेना की दौ सौ से ज्यादा टुकड़ियां (20 हजार जवान) लगी हैं। एनडीआरएफ के दल लोगों को बचाने के लिए दिन-रात एक किए हैं। अब तक एक लाख हजार लोगों को सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाया गया है। इस भीषण बाढ़ की वजह मानसूनी बारिश है, जो लगातार पांच दिनों तक होती रही। उसके बाद भूस्खलन ने हालात को और भयावह बना दिया है। जिससे हजारों मकान ध्वस्त हो गए हैं। सैकड़ों की संख्या में पुल-पुलिया और सड़कें नष्ट हो गई हैं। पूरे जम्मू-कश्मीर इलाके में ढाईहजार से ज्यादा गांवों में पानी घुसा हुआ है। इसमें से करीब 450 गांव जलमग्न हो गए हैं। अभी भी करीब चार लाख लोग जहां-तहां फंसे हुए हैं। उन तक किसी प्रकार की अब तक मदद नहीं पहुंच पाई है। वे लोग कई दिनों से अपने घरों की दूसरी-तीसरी मंजिल पर पनाह लिए हुए हैं। दक्षिण कश्मीर का इलाका पूरी तरह बाकी दुनिया से कट गया है। बाढ़ के कारण बिजली की आपूर्ति भी ठप पड़ी है। संचार सेवा पूरी तरह बंद हो गई है। लोग अपने परिवारों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। उनसे संपर्क करने के लिए संचार और सड़क व्यवस्था को जल्द दुरुस्त करने की जरूरत है। हालांकि सेना वैकल्पिक रूप से सड़कों और पुलों को ठीक करने में जुटी है। वहीं इंजीनियर संचार सेवा को बहाल करने का प्रयास कर रहे हैं, परंतु माना जा रहा है कि इसमें करीब हफ्ते भर का समय लगेगा। सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाए गए लोगों के लिए टेंट, कंबल और राशन का फौरी इंतजाम हुआ है। वहीं 65 मेडिकल टीम भी लोगों की देखभाल के लिए लगाई गई है, परंतु तबाही इतनी बड़ी है कि सारे इंतजाम कम पड़ गए हैं। केंद्र सरकार ने मदद पहुंचाने में तेजी दिखाई है। रविवार को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वहां जाना और मदद की घोषण करना मामले के प्रति उनकी गंभीरता को दिखाता है। घाटी में जनजीवन को पटरी पर लाने के लिए हरसंभव मदद करने की जरूरत है, जिससे राज्य के लोग इस संकट में खुद को अकेला ना समझें। इस आपदा ने हमारी प्रबंधन तैयारियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। यदि मौसम विभाग समय पर अनुमान लगाता व चेतावनी जारी करता और राज्य सरकार उसके अनुरूप कार्रवाई करती तो हालात इतने खराब नहीं होते। ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए एक केंद्रीकृत एजेंसी होनी चाहिए जहां लोग मदद के लिए संपर्क कर सकें। और पूरा राहत अभियान भी वहीं से संचालित होना चाहिए। इस घटना से सबके लेते हुए संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां आपदा प्रबंधन के इंतजामों को प्रमुखता दी जानी चाहिए।
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