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संकट की घड़ी में घाटी के साथ खड़ा है देश

प्राकृतिक आपदा पर किसी का जोर नहीं होता है।

संकट की घड़ी में घाटी के साथ खड़ा है देश
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प्राकृतिक आपदा पर किसी का जोर नहीं होता है। जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश के कारण पैदा हुई तबाही इसका सबूत है। बीते महीने भारी बारिश से भूस्खलन के कारण महाराष्ट्र का मालीन गांव दब गया था। वहीं गत वर्ष उत्तराखंड में आए प्रलाय की याद अभी भी ताजा है। जम्मू-कश्मीर की तबाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाढ़, भूस्खलन और मकान गिरने के कारण अब तक 200 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। शहरी इलाकों के अलावा ढाई हजार से ज्यादा गांव प्रभावित हुए हैं जिनमें से करीब 450 गांव जलमग्न हो गए हैं। लाखों की संख्या में लोग सुरक्षित ठिकानों की तलाश में हैं। हजारों मकान ध्वस्त हो गए हैं। सैकड़ों की संख्या में पुल-पुलिया और सड़कें नष्टहो गई हैं। हजारों एकड़ खेतों में लगी धान की फसल बर्बाद हो चुकी है, जिससे बाढ़ का पानी कम होने के बाद भी अकाल का खतरा उत्पन्न हो गया है। अधिकारियों के मुताबिक बाढ़ से अरबों रुपयों की सार्वजनिक और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ है। राज्य में आजादी के बाद पहली बार इतनी भयंकर बाढ़ आई है। राज्य प्रशासन का मानना है कि ऐसी तबाही 60 साल पहले आई थी। दक्षिण कश्मीर से संपर्क लगभग कट-सा गया है। बिजली की आपूर्ति ठप पड़ी है। संचार सेवा भी बंद हो गई है। यद्यपि हम प्राकृतिक आपदा को रोक तो नहीं सकते, परंतु समय पर राहत और बचाव कार्य से उसके प्रभाव या नुकसान को जरूर कम कर सकते हैं। इस मुश्किल घड़ी में घाटी के लोगों के साथ खड़ा रहने का जो मद्दा केंद्र व राज्य सरकार ने दिखाया है वह स्वागतयोग्य है। शनिवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने हवाई सर्वेक्षण किया था। उसके बाद रविवार को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वहां जाना मामले के प्रति गंभीरता को दिखाता है। केंद्र सरकार ने सुनिश्चित किया है कि घाटी को पटरी पर लाने के लिए राज्य सरकार की हरसंभव मदद की जाएगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि घाटी के लोग इस संकट में खुद को अकेला ना समझें उनके साथ पूरा देश खड़ा है। इसे पूरे देश की त्रासदी बता उनके दुख को बांटने की जो कोशिश की है उससे लोगों में उम्मीद जरूर जगी होगी। प्रधानमंत्री ने फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए बोट व हेलीकॉप्टर की तैनाती करने, उन तक स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुंचाने, बेघर हुए परिवारों के लिए पांच हजार टेंट लगाने और एक लाख कंबल बांटने के काम में तेजी लाने का निर्देश दिया है। वहीं पुल और सड़कों को ठीक करने के लिए सेना की मदद ली जा रही है। जम्मू-कश्मीर को आपदा कोष से 1100 करोड़ रुपये की मदद दी गई है, परंतु प्रधानमंत्री ने कहा है कि तबाही इतनी बड़ी है कि इससे काम नहीं चलेगा, लिहाजा अतिरिक्त 1000 करोड़ रुपये दी गई है और आगे भी जरूरत के अनुसार मदद मुहैया करायी जाएगी। उन्होंने पाक सरकार से भी अपील की कि पाक अधिकृत कश्मीर में उसे जो मदद चाहिए वह भारत देने को तैयार है। मौसम में सुधार आने के बाद सेना और एनडीआरएफ के हजारों जवानों को राहत व बचाव कार्य में लगाया गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि घाटी जल्द ही इस संकट से उबर जाएगी और वहां जनजीवन सामान्य हो जाएगा। हालांकि स्थानीय प्रशासन तबाही के बाद ही नींद से जागता है। अगर उसने मौसम विभाग की चेतावनी को पहले ही गंभीरता से लिया होता और इसकी जानकारी लोगों तक पहुंचाई होती तो कई बाढ़ प्रभावित गांवों को पहले ही खाली करवा लिया जाता। लगता है कि उत्तराखंड की तबाही से अभी हमने सबक नहीं लिया है!
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