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अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में इसरो की सफल उड़ान

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत लगातार सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ रहा है।

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में इसरो की सफल उड़ान

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत लगातार सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ रहा है। गुरुवार का दिन भी इसके लिए मील का पत्थर साबित हुआ जब इसरो ने श्री हरिकोटा स्थित सतीश धवन अतंरिक्ष केंद्र से जीएसएलवी मार्क-3 रॉकेट का सफल परीक्षण किया। यह अब तक का सबसे वजनदार और नवीनतम पीढ़ी का रॉकेट है। ऐसा रॉकेट भारत के पास नहीं था। इसे इसरो के वैज्ञानिकों ने स्वयं बनाया है। इसकी महत्ता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता हैकि बिना इस रॉकेट के भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम अधूरा था। इसके सफल परीक्षण के साथ ही अब भारत उन देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो अंतरिक्ष में बड़े उपग्रह भेजने की काबिलियत रखते हैं। यह रॉकेट चार टन या उससे अधिक वजन के उपग्रह ले जाने में सक्षम है। अर्थात भारत अब इनसेट-4 जैसे भारी संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण में पूरी तरह आत्मनिर्भर बन गया है।

इनसेट-4 श्रेणी के उपग्रह का वजन चार से पांच टन तक होता है। इस श्रेणी के उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए भारत अब तक दूसरे देशों पर निर्भर था। लिहाजा अब न सिर्फ देश की अरबों डॉलर पूंजी बचेगी बल्कि इसरो दूसरे देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में भेज कर व्यावसायिक बाजार में भी अपनी दावेदारी मजबूत कर सकेगा। भारत को इसके साथ एक और बड़ी सफलता मिली है। दरअसल, यह रॉकेट परीक्षण के तौर पर अपने साथ एक मानवरहित कैप्सूल (क्रू मॉड्यूल) भी लेकर गया था। इसरो के वैज्ञानिक इस कैप्सूल को अंतरिक्ष में भेज कर उसे सकुशल धरती पर वापस लाने में सफल रहे। अर्थात इसरो ने अब अंतरिक्ष में मानव को भेजने और उसे वापस लाने की तकनीकी हासिल कर ली है।

दूसरे शब्दों में, इसरो अब ऐसा कैप्सूल बनाने में सक्षम है जो 1600 डिग्री सेल्सियस तक गरम वायुमंडल की विपरीत परिस्थितियों को भी झेल सकता है। ऐसे कैप्सूल में ही अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजा जाता है। हालांकि इस प्रयोग के सफल रहने के बाद भी इसरो को अंतरिक्ष में मानव मिशन भेजने में तकरीबन पांच साल लगेंगे। अभी तक रूस, अमेरिका और चीन के पास इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की काबिलियत थी, अब भारत भी इस सूची में शामिल हो गया है। देखा जाए तो 2014 इसरो के लिए कई ऐतिहासिक उपलब्धियों वाला साल रहा है।

इसी वर्ष सितंबर महीने में भारत पहली बार मंगल ग्रह पर कदम रखने में सफल हुआ जब अंतरिक्ष संगठन इसरो ने मंगलयान को सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में स्थापित कर दिया। यह कितनी बड़ी कामयाबी है इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि किसी भी देश को अपने पहले प्रयास में मंगल पर मिशन भेजने में सफलता नहीं मिली थी। जबकि भारत ने अपने पहले ही प्रयास में यह कर दिखाया, वह भी बहुत ही कम लागत में। अभी तक अमेरिका, रूस और यूरोपियन यूनियन ही मंगल पर उपग्रह भेज सके हैं। इसरो का पीएसएलवी यान अपनी लगातार 24 सफल उड़ानें पूरी करने के साथ ही इस साल चार देशों के उपग्रहों को एक साथ कक्षा में स्थापित करने का भी रिकॉर्ड बनाया है। साल 1969 में इसरो की स्थापना हुई थी और 1975 में इसने अपने पहले उपग्रह अर्यभट्ट को रूस की मदद से पृथ्वी की कक्षा में भेजा था। कहा जा सकता है कि इसरो अपने वैज्ञानिकों की मेहनत के बल पर लगातार नईऊंचाइयों को छू रहा है।

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