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अंतरिक्ष जगत में इसरो की बड़ी उपलब्धि

2016 में भारत अपना दूसरा चंद्रयान मिशन भेजेगा।

अंतरिक्ष जगत में इसरो की बड़ी उपलब्धि
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भारत अंतरिक्ष विज्ञान में सफलता के लगातार झंडे गाड़ रहा है। इसी कड़ी में सोमवार को एक और उपलब्धि जुड़ गई जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने भरोसेमंद रॉकेट पीएसएलवी के जरिए देश की पहली अंतरिक्ष वेधशाला एस्ट्रोसैट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में स्थापित कर दिया। भारत अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और जापान के बाद ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है। इसके अलावा भारत पहला ऐसा विकासशील देश भी बन गया है जिसकी अंतरिक्ष में अपनी वेधशाला यानी दूरबीन होगी। चीन फिलहाल अपनी अंतरिक्ष वेधशाला पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि इससे ब्रांड और आकाशीय वस्तुओं को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी।
वैज्ञानिक इससे ब्लैक होल्स और तारों व आकाशगंगाओं के बनने तथा नष्ट होने के बारे में अध्ययन कर सकेंगे। यह वेधशाला पांच वर्षों तक अपनी सेवाएं देगी। पीएसएलवी-सी30 रॉकेट के जरिए छोड़ा गया एस्ट्रोसैट अपने साथ छह विदेशी उपग्रह भी ले गया, जिनमें से चार अमेरिकी थे। यह पहली बार है, जब भारत ने अमेरिकी उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं। पीएसएलवी रॉकेट ने भी लगातार 30वीं सफल उड़ान भर कर अपनी विश्वसनीयता को साबित किया है। आज भारत अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में पचास वर्षपूरा करने के साथ ही अब तक 45 विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर चुका है। गत महीने इसरो को क्रायोजेनिक तकनीकी युक्त जीएसएलवी यान को उड़ाने में महारत हासिल हुई थी। देश पीएसएलवी से छोटे उपग्रहों को भेजने में पहले ही महारत हासिल कर चुका है, मंगलयान इसका प्रमाण है।
इसका अर्थ है कि भारत अब सभी तरह के मसलन दो टन या इससे अधिक वजनी उपग्रहों के प्रक्षेपण में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है। कुछ दिनों पहले तक दुनिया के चुनिंदा देशों जैसे अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस और चीन के पास ही ऐसी तकनीकी थी। जाहिर है, अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों, उपग्रहों के लिए बड़े अंतरिक्ष मिशन भेजने में भारत सक्षम हो गया है। वैज्ञानिकों के अथक पर्शिम के कारण ही हम आज अंतरिक्ष विज्ञान में इतना आगे बढ़ सके हैं। दूसरे देशों पर निर्भरता खत्म होने से इसरो को प्रक्षेपण खर्च को कम करने में मदद मिली है। अन्य देशों के उपग्रहों को स्थापित करके विदेशी मुद्रा भी अजिर्त की जा रही है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए इसरो की आगे की राह आसान हो जाएगी। 2016 में भारत अपना दूसरा चंद्रयान मिशन भेजेगा। भारत सामरिक क्षेत्र में भी तकनीकी स्तर पर आत्मनिर्भरता प्राप्ति की ओर अग्रसर है। तकनीकी प्रगति से युवाओं में विज्ञान के प्रति आकर्षण बढ़ने के साथ वैज्ञानिकों में भी नया उत्साह आएगा। आज जिस तरह की भौगोलिक परिस्थितियां बन रही हैं, उससे निपटने के लिए भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ तकनीकी में भी आत्मनिर्भर होना जरूरी है। इससे दुनिया में भारत अपनी धमक बढ़ा सकेगा।
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