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चिंतन: अफगानिस्तान में आईएस की दस्तक चिंताजनक

मौजूदा अफगान सरकार आतंकवाद से निपटने में सक्षम नहीं दिख रही है। नए राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कमजोरी का ही परिचय दिया है।

चिंतन: अफगानिस्तान में आईएस की दस्तक चिंताजनक
अफगानिस्तान में इन दिनों जिस तरह से आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं, वह चिंताजनक है। ऐसा लग रहा है कि अमेरिका की अगुआई वाले नाटो सैनिकों की वापसी के बाद आतंकवादी बेखौफ होते जा रहे हैं। इस पर आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हुईं विश्व शक्तियों को सोचने की जरूरत है। मंगलवार को राजधानी काबुल में भीषण धमाका हुआ, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए। यह धमाका डिप्लोमैटिक एरिया में हुआ, जहां विभिन्न देशों के राजनयिक रहते हैं। इसके कुछ ही दिन पहले आतंकवादियों ने काबुल हवाई अड्डे के पास यूरोपीय संघ के काफिले पर हमला बोला था।
पिछले ही हफ्ते आतंकवादियों ने काबुल के एक गेस्ट हाउस पर धावा बोलकर चौदह लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिनमें चार भारतीय भी थे। बताया यह भी जाता है कि गेस्ट हाउस हमले में आतंकवादियों के निशाने पर वस्तुत: भारत के राजदूत थे। इन सारे फिदायीन हमलों की जिम्मेदारी आतंकी संगठन तालिबान ने ली है। वहीं पिछले साल हेरात स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास में हुए आतंकवादी हमले को देश ने अभी भूला नहीं है।
नाटो सैनिकों के हमलों में भले ही तालिबान के प्रमुख आतंकियों की मौत हो गई है। उसको भारी नुकसान भी पहुंचा है। बावजूद इसके ये हमले बताते हैं कि तालिबान का दुस्साहस प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इन हमलों में एक समानता यह भी है कि आतंकवादियों के निशाने पर विदेशी राजनयिक और उनके दफ्तर हैं। जाहिर है, अफगानिस्तान में पैदा हुए सुरक्षा संकट का फायदा उठाते हुए आतंकवादी अपना विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं। काबुल में हुए हमले बताते हैं कि तालिबान ने अपना पैर फैलाना आरंभ कर दिया है। अफगानिस्तान अलकायदा का भी गढ़ रहा है। इन दिनों वह भी अपनी शक्तियों को बढ़ाने में लगा है। अभी कुछ ही दिन हुए हैं जब वहां दुनिया के खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस की दस्तक देने की खबरें आई थीं। वह अफगानिस्तान के नौजवानों को आतंक के रास्ते पर चलने को प्रेरित कर रहा है। करीब-करीब ऐसी ही स्थिति इस समय पाकिस्तान में है। एशियाई देशों, खासकर भारत, के लिए यह दोहरे चिंता की बात है, क्योंकि यह इन दोनों देशों के पड़ोस में स्थित है। मौजूदा अफगान सरकार आतंकवाद से निपटने में सक्षम नहीं दिख रही है।
नए राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कमजोरी का ही परिचय दिया है। अब तक उन्होंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जिससे लगे कि वे हिंसा और अस्थिरता रोकना चाहते हैं। उनकी सरकार अपनी ही मुश्किलों में उलझी है। तो ऐसे हालात में आतंकी ताकतें सिर उठाएंगी ही। और तो और वे उस पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ा रहे हैं, जिसका अफगानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने में हाथ रहा है। भारत अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता देखना चाहता है। गत दिनों भारत दौरे पर आए अशरफ गनी ने कहा था कि वे भारत के साथ मिलकर आतंकवाद को खत्म करने को प्रतिबद्ध हैं, लेकिन इन घटनाओं और उनके रवैए को देखकर तो ऐसा प्रतीत होता है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान आतंकवादियों का एक बार फिर पड़ाव बन जाएगा।
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