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अप्रासंगिक कानूनों के अंत की शुरुआत

इसके साथ ही मोदी सरकार कईनियमों-कानूनों को सरल बनाने का भी प्रयास कर रही है।

अप्रासंगिक कानूनों के अंत की शुरुआत
केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने बेकार पड़ चुके करीब एक हजार कानूनों को संसद के अगले सत्र में खत्म करने का फैसला किया है। वैसे भी काल के हर खंड में समाज और देश की जरूरतें अलग-अलग होती हैं। इस दौरान वहां के निवासियों के रहन-सहन व सोच में व्यापक बदलाव आ जाता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए कोई देश नियम-कानूनों का निर्माण करता है, परंतु परिवर्तन भी प्रकृति का शाश्वत नियम है। लिहाजा, जब समाज और उसकी सोच बदल जाती है तब उसकी प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं। ऐसे में नए कानूनों की जरूरत महसूस होने लगती है। यही वजह है कि पुराने कानूनों में समय-समय पर संशोधन की जरूरत पड़ती है। उसकी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए ऐसा करना अनिवार्य है। वहीं जिन कानूनों की कोई जरूरत नहीं उन्हें खत्म कर देना चाहिए, परंतु देश में इसकी गति धीमी रही है। यह उचित नहीं कि 21वीं सदी के समाज का सौ साल पुराने कानूनों से नियमन किया जाए। ये निश्चित रूप से विकास की गति में अवरोध पैदा करते हैं या कर रहे हैं। देश में पुराने पड़ चुके कानूनों को खत्म करने की मांग लंबे समय से होती रही है, परंतु पूर्व की सरकारें उन्हें खत्म करने की बजाय नए-नए कानूनों का अवरण चढ़ाती रहीं। पूर्व में बनी कई कमेटियों ने इस ओर ध्यान दिलाया, परंतु यूपीए सरकार ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इसकी वजह से कई समस्याओं को हमने बैठे-बैठे निमंत्रण दे दिया है। जिनका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार अपने संबोधनों में किया है। आज भारत में विदेशी निवेशकों को आने में एक बड़ी बाधाअप्रासंगिक हो चुके कानूनों का चलन में होना भी है। वहीं अनावश्यक कानूनों के जाल ने भी मामले को पेचीदा बना रखा है। ऐसे में मोदी सरकार की ओर से अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को खत्म करने की पहल सही दिशा में एक प्रयास है। नई सरकार सत्ता में आने के बाद से ही गैरजरूरी कानूनों की पहचान कर उन्हें समाप्त करने के प्रति गंभीर रही है। इसके साथ ही मोदी सरकार कईनियमों-कानूनों को सरल बनाने का भी प्रयास कर रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी उन्होंने लोगों को कानूनों के मकड़जाल से मुक्ति दिलाने वायदा किया था। संसद के पिछले सत्र में भी मोदी सरकार ने 36 असंगत कानूनों को रद्द करने का विधेयक पेश किया था। दरअसल, विधि आयोग ने 16 साल पहले ही ढाई सौ कानूनों को रद्द करने की सिफारिश की थी, जिन्हें अब तक रद्द नहीं किया गया। पीसी जैन कमेटी ने भी 250 अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को खत्म करने की सिफारिश की थी। 22 ऐसे भी बेकार पड़े कानून हैं, जो राज्यों से संबंधित हैं। 1998 में जैन कमेटी ने ही 700 विनियोग व वित्त विधेयकों को खत्म करने की सिफारिश की थी, जो अनुपयोगी व बेकार हो चुके हैं। ऐसे विधेयकों की जरूरत सीमित समय के लिए ही होती है। कुछ ऐसे भी कानून हैं, जो 175 साल पुराने हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय-अमेरिकी समुदाय को दिए अपने भाषण में कहा कि उनकी सरकार पुराने पड़ चुके कानूनों को खत्म करने के प्रति गंभीर है। वैसे भी जितने ज्यादा कानून होते हैं लालफीताशाही की संभावना उतनी ही अधिक होती है। समाज पर अनावश्यक कानून का बोझ नहीं डालना चाहिए।
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