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ईरान के साथ परमाणु समझौता बड़ी उपलब्धि

परमाणु समझौता ईरान और पश्चिमी देशों के बीच दशकों पुराने मतभेदों को भी दूर करेगा।

ईरान के साथ परमाणु समझौता बड़ी उपलब्धि

ईरान और दुनिया के छह ताकतवर देशों (अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन और र्जमनी) के बीच परमाणु समझौता होना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इस करार से न केवल पश्चिम एशिया में शांति आएगी, बल्कि यह ईरान और पश्चिमी देशों के बीच दशकों पुराने मतभेदों को भी दूर करेगा। इससे आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया में कट्टरपंथी संगठनों पर लगाम लगाने और इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने में मदद मिलेगी। निश्चित रूप से इसका र्शेय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी को जाता है। रूहानी न केवल अमेरिका से ऐतिहासिक कटुता को परे रखे, बल्कि कट्टरपंथियों को भी दरकिनार करने में सफल रहे। उन्होंने इस समझौते के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया और दृढ़तापूर्वक आगे बढ़े। करार की शतरें के तहत अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और संयुक्त राष्ट्र ईरान पर लगे तमाम प्रतिबंध हटा लेंगे, और बदले में ईरान लंबे समय के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम सीमित कर देगा यानी वह परमाणु बम नहीं बनाएगा।

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2002 से ही अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य यह आशंका जता रहे थे कि ईरान परमाणु बम बना रहा है, हालांकि वह इससे हमेशा इंकार करता रहा। परमाणु केंद्रों की निगरानी की इजाजत नहीं मिलने के बाद पश्चिमी देशों ने उस पर कईतरह के प्रतिबंध लगा दिए थे। अब इस समझौते के बाद ईरान के सभी परमाणु केंद्र और सैन्य ठिकाने संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में आ जाएंगे। हालांकि ऊर्जा पैदा करने के लिए वह परमाणु रिएक्टरों का परिचालन जारी रखेगा। शर्त तोड़ने पर ईरान पर 65 दिनों के भीतर फिर से प्रतिबंध लगाने का प्रावधान भी है। संयुक्त राष्ट्र के हथियार निरीक्षक पांच साल तक ईरान में रहेंगे और साथ ही वह अगले आठ साल तक किसी भी तरह की मिसाइल नहीं खरीदेगा। ईरान को इसका फायदा ये होगा कि वह दुनिया के दूसरे देशों के साथ तेल और दूसरी चीजों का कारोबार कर पाएगा। साथ ही सौ अरब डॉलर की जब्त संपत्ति का इस्तेमाल कर पाएगा। प्रतिबंध की वजह से अभी तक इस पर रोक लगी थी। भारत को इससे काफी फायदा होगा, क्योंकि अब उससे सस्ती दरों पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद सकता है।

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ईरान का तेल बाजार में आने से आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमत और कम हो सकती है, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को फायदा होगा। इसके साथ ही ईरान अफगानिस्तान या मध्य एशिया के दूसरे देशों जैसे तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान आदि के लिए भारत का गेट वे बन सकता है जिससे भारत का उन देशों में पहुंचना आसान हो जाएगा। पश्चिम एशिया के बदल रहे भूराजनीतिक परिदृश्य ने भी अमेरिका और ईरान को करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दोनों इराक में आईएस के खिलाफ लड़ाई में मिलकर सहयोग कर रहे हैं। दोनों के साथ आ जाने पर इस क्षेत्र में शांति बहाली की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि इस करार के समक्ष चुनौतियां भी मौजूद हैं, क्योंकि इससे इजरायल, सऊदी अरब, अमेरिका में रिपब्लिकन और ईरान के कट्टरपंथी खुश नहीं हैं। वहीं समझौता को लागू कराने से पूर्व इसे कई बाधाओं जैसे अमेरिकी सीनेट, ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद से पार करना होगा। बहरहाल, विशेषज्ञों का कहना हैकि आने वाले दिनों में यह करार इन बाधाओं को आसानी से पार कर जाएगा। कुल मिलाकर इस समझौते के बाद दुनिया के साथ ईरान के रिश्तों में एक नया अध्याय शुरू हुआ है।

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