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चिंतन: आईओसी का नंबर वन रुतबा बनेगा मिसाल

यह रिफाइनरी इंडियन ऑयल कारपोरेशन (आईओसी) की यूनिट है, जो 34,555 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुई है।

चिंतन: आईओसी का नंबर वन रुतबा बनेगा मिसाल

पीएम नरेंद्र मोदी के पारादीप रिफाइनरी को राष्ट्र को समर्पित करने के साथ ही आईओसी देश की नंबर वन रिफाइनरी कंपनी बन गई। यह रिफाइनरी इंडियन ऑयल कारपोरेशन (आईओसी) की यूनिट है, जो 34,555 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुई है। सरकारी कंपनी आईओसी निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को पछाड़ कर नंबर वन का रुतबा हासिल किया है। पारादीप रिफाइनरी 16 साल में पूरा हुआ है। 24 मई 2000 को तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने इसकी आधाशिला रखी थी। यह आईओसी का नौंवां संयंत्र है। इस समय आईओसी के नंबर वन बनने के दो बड़े महत्व हैं। पहला यह कि जब सरकार विनिवेश की नीति को और उदार बना रही है व शानदार प्रदर्शन कर रही सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) में हिस्सेदारी बेच रही है और वह भी इस सोच के साथ कि पीएसयू अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, तब किसी पीएसयू का निजी कंपनी को पछाड़ कर नंबर वन बनना विनिवेश नीति की समीक्षा की ओर इशारा करता है। दूसरा बड़ा महत्व यह है कि इसी माह 29 फरवरी को बजट आ रहा है, जिसमें वह विनिवेश नीति पर भी रोशनी डालेगी। दरअसल, जब सरकार देश में उदारीकरण की नीति को लागू कर रही थी, तब तेजी से यह परसेप्शन बनाया गया कि सरकारी क्षेत्र अच्छा परफॉर्म नहीं कर रही है, घाटे में है, इसलिए इसे निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया जाए और सरकारी क्षेत्र के निजीकरण की प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने के लिए विनिवेश नीति लाई गई। इस नीति के आने के बाद यह कहा जाने लगा कि घाटे में चल रही सरकारी कंपनियों को कौन खरीदेगा, इसलिए फायदे वाली कंपनियों का विनिवेश किया जाए। नतीजा यह हुआ कि घाटे के साथ-साथ फायदे वाली कंपनियों में भी विनिवेश हुआ। लेकिन आईओसी ने नंबर वन बन कर विनिवेश के पीछे की सोच को पलट दिया है। अब यह नहीं कह सकते कि केवल निजी क्षेत्र का प्रबंधन ही चुस्त होता है, सरकारी क्षेत्र का नहीं। दूसरी सरकारी कंपनी ओएनजीसी के बारे में एक अहम बात है कि इसके पास भी रिलायंस इंडस्ट्रीज की तरह ही भरपूर नकदी भी है। वह जब चाहे, जहां चाहे निवेश कर सकती है। आईओसी ने सरकार के नीति नियंताओं को एक आईना भी दिखाया है कि पीएसयू के विनिवेश के लिए आंखमूंद कर नीति नहीं बनाई जाए। ऐसा नहीं है कि विनिवेश गलत है, होना चाहिए, लेकिन या तो केवल घाटे में चल रही कंपनियों का विनिवेश हो या फिर किसी भी कंपनी में 25 फीसदी पब्लिक होल्डिंग रखने के सरकारी नियम को पूरा करने के लिए हो। हालांकि इधर के कुछ सालों में विनिवेश की प्रक्रिया धीमी हुई है, जिसके चलते सरकार वित्त वर्ष के दौरान अपने विनिवेश लक्ष्य को पूरा नहीं कर पा रही है। ग्लोबल एजेंसी ऑक्सफेम की 'एक फीसदी बनाम 99 फीसदी रिपोर्ट' भी कहती है कि निजीकरण से न उम्मीद के अनुरूप रोजगार सृजन हुआ है और न ही अपेक्षित खुशहाली आई है, बल्कि अमीर और गरीब की खाई बढ़ी है। इसलिए एक बार फिर महसूस किया जाने लगा है कि विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर यह है कि सरकारी और निजी क्षेत्र कंधा से कंधा मिलकर चलें। शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, सामाजिक सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन जैसे क्षेत्र हैं, जिनमें सरकारी पहल जरूरी है। इसलिए अंधाधुंध निजीकरण समस्या का हल नहीं है। लेकिन हां सरकारी क्षेत्र के प्रबंधन में व्यापक सुधार और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की जरूरत है। इसके साथ ही कामकाज में पारदर्शिता व चुस्ती भी होनी चाहिए। जैसा पीएम ने आईओसी के बहाने कहा है कि सरकारी प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो तो बढ़ती लागत से पार पा सकते हैं और तेजी से रोजगार सृजन हो सकता है। अब सोचना पीएसयू व सरकार को है।

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