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असहिष्णुता और नफरत को दहन करे समाज

जिस तरह से यहां अलग अलग सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान वाले लोग मिलजुलकर साथ रहते हैं उसकी मिसाल दुनिया देती है।

असहिष्णुता और नफरत को दहन करे समाज
दशहरा सहित सभी त्योहार हमें आपसी भाईचारा, सहिष्णुता और सहनशीलता का संदेश देते हैं। दरअसल, इन्हीं गुणों के चलते किसी समाज को वह जीवंतता हासिल होती है जिससे कि वह वसुधैव कुटुंबकम का संदेश दुनिया को दे सके। भारत की भूमि इस मायने में खुशकिस्मत रही है कि यहां कण-कण में यह भावना व्याप्त है। यही वजह है कि यहां कदम-कदम पर विविधता होने के बावजूद लोगों में एकजुटता सदियों से बरकरार है। जिस तरह से यहां अलग अलग सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान वाले लोग मिलजुलकर साथ रहते हैं उसकी मिसाल दुनिया देती है। यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। इसे हमें किसी भी कीमत पर खोना नहीं है। भारत दुनिया का सबसे सफल लोकतंत्र भी इसीलिए बन पाया है क्योंकि हमारी बुनियाद में सभी तरह के विचारों व मान्यताओं को आदर करना निहित है। बहरहाल, इतनी विशाल आबादी को समेटे हमारा देश भी कभी-कभी ऐसी घटनाओं का शिकार हो जाता है जो हमारी सामाजिक सौहार्द की जड़ों पर चोट करती प्रतीत होती हैं। इसके बावजूद हमारी मानवीय संवदेना तमाम नकारात्मक बातों को भुलाकर हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती रहती है। हाल के दिनों में भी कुछ ऐसी हिंसक वारदातें हुई हैं जो हमारी सहिष्णुता पर दाग की तरह हैं। बिसाहड़ा के अखलाक व कन्नड़ लेखक एम कुलबर्गी की हत्या और फरीदाबाद में एक दलित परिवार के दो बच्चों को जलाकर मारने जैसी विभत्स घटनाओं को भारतीय समाज कभी भी जायज नहीं ठहरा सकता है। इसी कड़ी में शिवसैनिकों द्वारा सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोंतने, बीसीसीआई के दफ्तर में जबरन घुसकर अध्यक्ष शशांक मनोहर को पाकिस्तान से क्रिकेट मैच नहीं खेलने के लिए धमकाने और कश्मीर के निर्दलीय विधायक के ऊपर कुछ लोगों द्वारा स्याही फेंकने जैसी निंदनीय घटनाएं भी घटीं। विरोध का यह लोकतांत्रित तरीका नहीं है। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ठीक कहा हैकि यह तो गुंडगर्दी हुई। हम एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं। यहां हर किसी को विरोध का अधिकार है। यह उसका संवैधानिक हक है, लेकिन इसके लिए एक सभ्य तरीका है, जिसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। आप शांतिपूर्वक आलोचना कर सकते हैं, लेकिन जबरन अपनी बात नहीं थोप सकते। इससे हमारा लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। साथ ही सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ जाएगा। इन दिनों देश में नफरत की राजनीति का भी खूब बोलबाला है। नेताओं के बीच जिस तरह के अपशब्दों का इस्तेमाल किया जाने लगा है उससे लग रहा है कि राजनीति न हो बल्कि अखाड़ा हो। नेता नहीं भूलें कि राजनीति में वैचारिक मतभेद होने ठीक हैं, मनभेद नहीं होने चाहिए। इससे नैतिक विकास की दिशा उल्टी हो सकती है। जो देश दुनिया का सिरमौर बनने जा रहा है उसके समाज और राजनीति में असहनशीलता और नफरत का प्रवेश चिंता की बात है। आज विजयदशमी के दिन समाज अपने अंदर मौजूद असहिष्णुता रूपी रावण को जलाने का संकल्प ले।
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