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बीमा संशोधन विधेयक का विरोध अनुचित

बीमा संशोधन विधेयक पर कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक पार्टियों का नकारात्मक रुख दुर्भाग्यपूर्ण है।

बीमा संशोधन विधेयक का विरोध अनुचित
बीमा संशोधन विधेयक पर कांग्रेस सहित कुछ राजनीतिक पार्टियों का नकारात्मक रुख दुर्भाग्यपूर्ण है। बदहाल भारतीय अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर कैसे लाया जाए और देश में निवेश का माहौल कैसे दुरुस्त किया जाए मौजूदा दौर में यह एक चुनौतीपूर्ण प्रश्न बना हुआ है। इस हालात को बदलने के लिए वर्षों से लंबित कई आर्थिक सुधार की प्रक्रियाओं को तेजी से लागू किये जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। बीमा क्षेत्र में सुधार भी इसी कड़ी का हिस्सा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में पेश आम बजट में बीमा व रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव किया था। उसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले महीने बीमा क्षेत्र में एफडीआई सीमा को वर्तमान 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार इस बीमा संशोधन विधेयक को जल्दी से पारित कराना चाहती है। सोमवार को सरकार ने राज्यसभा में इसे पेश करने का मन बनाया था, परंतु कांग्रेस सहित कुछ दलों के विरोध के कारण टालना पड़ा। विरोध को देखते हुए संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आम सहमति बनाने के लिए सभी दलों के प्रतिनिधियों से चर्चा भी की पर बैठक बेनतीजा रही। हालांकि चर्चा के बाद कांग्रेस, जदयू और राजद को छोड़ शेष दलों के रुख में कुछ नरमी आई है। विरोधी दलों की मांग है कि इस विधेयक को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए, जहां विमर्श के बाद आगे निर्णय लिया जाएगा। दरअसल, इस पर पहले भी बहुत चर्चा हो चुकी है, जिसमें कई संशोधन सुझाए गए हैं। लिहाजा इसे अब सेलेक्ट कमेटी में भेजने की कोई जरूरत नहीं है। ऐसा लगता हैकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की आड़ में इसे लटकाना चाहते हैं। और इस तरह कांग्रेस मोदी सरकार के सुधार के एजेंडे को बाधित करना चाहती है, परंतु इस तरह वह पूरी तरह एक्सपोज भी हो गई है। क्योंकि सत्ता में रहते हुए वह इस विधेयक के पक्ष में थी। हालांकि दूसरे दलों के नरम रुख को देखते हुए ऐसा लग रहा हैकि मोदी सरकार कांग्रेस के सहयोग के बिना भी राज्यसभा से विधेयक पारित करा लेगी। आज तमाम बीमा कंपनियां पूंजी की कमी से जूझ रही हैं और घाटे में हैं। 2001 से 2009 के बीच जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में बीमा क्षेत्र की हिस्सेदारी 2.7 से 5.2 फीसदी तक पहुंच गई थी, लेकिन उसके बाद 2012 तक इस क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी लगातार कम होने लगी है। इन्हें उबारने के लिए विदेशी निवेश की सीमा में वृद्धि जरूरी है। बीमा संशोधन विधेयक यदि कानून का शक्ल ले लेता हैतो इससे बीमा उद्योग में करीब 25,000 करोड़ रुपये का नया निवेश आने की उम्मीद है। इससे बीमा कंपनियां बाजार में नये बीमा उत्पाद ला सकेंगी और ज्यादा नौकरियां भी दे सकेंगी। अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करना सत्ता पक्ष सहित सभी दलों का दायित्व होना चाहिए। लिहाजा उन्हेें मिलकर कर इस दिशा में उचित फैसला लेने में भागीदार बनना चाहिए। जिससे आगे रक्षा और रेलवे में भी सुधार की प्रक्रिया तेज हो सके।
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