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भारत-चीन सम्बन्ध नये दौर में पहुंचने के संकेत

भारत-चीन पड़ोसी देश हैं। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी दोनों देशों में रहती है। इनकी समस्याएं भी एक जैसी हैं।

भारत-चीन सम्बन्ध नये दौर में पहुंचने के संकेत
ब्राजील के फोर्टलेजा में हो रहे ब्रिक्स सम्मेलन के इतर सोमवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात कईमायने में अहम कही जाएगी। इस बैठक के लिए चालीस मिनट का वक्त तय किया गया था, लेकिन दोनों के बीच बातचीत एक बार शुरू हुई तो यह अस्सी मिनट तक चली। दोनों नेताओं ने एक दूसरे को न्योता भी दिया। अब शी जिनपिंग सितंबर में भारत आएंगे और नरेंद्र मोदी का चीन यात्रा के लिए कार्यक्रम अभी तय होना है। सकारात्मक माहौल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन ने भारत को एपेक देशों की बैठक में शिरकत करने का निमंत्रण दिया है जबकि भारत इस 21 देशों के समूह का सदस्य भी नहीं है।
भारत में नई सरकार के बने करीब छह हफ्ते ही हुए हैं पर दोनों के बीच अब तक चार उच्चस्तरीय वार्ता हो चुकी है। पहले शी के दूत के रूप में चीनी विदेश मंत्री वांग दिल्ली पहुंचे और इसके बाद उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने हाल में चीन का दौरा किया। भारत चीन के बीच तीन मुद्दे हैं, जिनका सार्थक हल निकालने की जरूरत है। पहला, व्यापार असंतुलन। दोनों देशों के बीच जो व्यापार हो रहा है वह चीन के पक्ष में ज्यादा झुका है। अर्थात भारत से चीन को निर्यात कम होता है जबकि चीन से भारत की तरफ निर्यात ज्यादा होता है। इस व्यापार असंतुलन को ठीक करने की जरूरत है। दूसरा, सीमा विवाद। भारत चीन सीमा का बड़ा हिस्सा विवादित है। चीन मैकमोहन रेखा को नहीं मानता है। वह अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर दावेदारी जताता रहा है। तीसरा, पाक अधिकृत कश्मीर में चीन की अवैध गतिविधि। वहीं लद्दाख में चीन की घुसपैठ एक अलग समस्या है। ये सारी चीजें ऐसी हैं जिन पर सतही तौर पर बातचीत होती रही है। कभी भी मुद्दों को सुलझाने के प्रति गंभीरता नहीं दिखी। यही वजह है कि सालों बाद भी कोई रास्ता नहीं निकल पाया है।
भारत-चीन पड़ोसी देश हैं। दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी दोनों देशों में रहती है। दोनों विकासशील देश हैं। इनकी समस्याएं भी एक जैसी हैं। 1962 के बाद स्थितियां काफी बदली हैं। भारत एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। दुनिया में भारत तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था है। यह दुनिया के लिए एक बड़ा बाजार है। चीन भी समझता है कि व्यापार के लिहाज से भारत आज उसकी जरूरत है। यही वजह है कि वह संवाद बनाए रखना चाहता है।
दोनों देशों के बीच हर साल शिखर वार्ताएं होती हैं। अब चीनी राष्ट्रपति ने नरेंद्र मोदी को आमंत्रित भी किया है। तो दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलित हो, भारत की भागीदारी बढ़े, चीन की दादागिरी खत्म हो और फिर सीमाई तथा दूसरे विवाद जल्द से जल्द हल हों। दोनों देशों के विकास और शांति के लिए यह जरूरी है। जिस तरह से दोनों की बातचीत हुई, उससे इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि दोनों देशों के बीच जो मुद्दे हैं उन पर गंभीरता से विचार विर्मश हुआ है। दोनों देश विवादित मुद्दों को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ने पर गंभीर हैं। जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं चीन ने विवादित मुद्दों को हल करने में गंभीरता दिखाई है। इधर, सीमा पर चीन की ओर से घुसपैठ में भी कमी आई है। इसे एक सकारात्मक संदेश माना जाना चाहिए।
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