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अफगानिस्तान में कायम है आतंकवाद की चुनौती, समझता है भारत को पांरपरिक दोस्त

अफगानिस्तान भारत को अपना पारंपरिक दोस्त समझता है।

अफगानिस्तान में कायम है आतंकवाद की चुनौती, समझता है भारत को पांरपरिक दोस्त

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत दौरे से ठीक पहले बुधवार को अफगानिस्तान में सैनिक मिशन को खत्म करने का औपचारिक ऐलान तो कर दिया है, परंतु वहां अभी आतंकवाद की चुुनौती कायम है। नौ सितंबर, 2001 में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में अलकायदा, तालिबान सहित सभी आतंकियों को खत्म करने के लिए युद्ध छेड़ दिया था। अमेरिका के लिए यह सबसे लंबे और महंगे युद्धों में से एक साबित हुआ है। इस पर अमेरिका ने एक खरब डॉलर से अधिक खर्च किए हैं। वहीं इसमें 2300 से अधिक अमेरिकी सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, परंतु आज युद्ध खत्म होने के 13 साल बाद कई सवाल हैं, जिनके जवाब नहीं मिले हैं। मसलन जिस आतंकवाद को खत्म करने के लिए तत्कालीन बुश प्रशासन ने इस जंग की शुरुआत की थी, आज उसकी भयावहता 9/11 से कहीं अधिक नजर आ रही है। अफगानिस्तान की स्थिरता और सुरक्षा पर भी शंका की तलवार लटक रही है।

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आज दुनिया का कोई कोना नहीं है जहां आतंकियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव नहीं है। पश्चिम एशिया के एक बड़े क्षेत्र पर आतंकियों का कब्जा है। वहीं अफगानिस्तान और पाकिस्तान में तालिबान की जड़ें अब भी मजबूत हैं। पेशावर के स्कूल पर हमला कर तालिबान ने जता दिया है कि उसकी ताकत में कोई कमी नहीं आई है, वह काबुल पर भी हमले करते आ रहा है। आज पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर बड़ा क्षेत्र आतंकियों के कब्जे में है। अफगानिस्तान में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं, तालिबान का वहां के कई क्षेत्रों पर अभी भी गहरा प्रभाव है। हालांकि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 3.5 लाख अफगान सैनिकों की सेना तैयार की गई है। इनकी मदद के लिए अगले कुछ सालों तक 11 हजार अमेरिकी जवान वहां तैनात रहेंगे, जो अफगान सुरक्षा बलों को देश में आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाने के लिए प्रशिक्षित करेंगे और उन्हें सलाह एवं सहयोग देंगे, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद के आसन्न खतरों का सामना करने के लिए वे काफी नहीं हैं। वहीं अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तान की मंशा भी ठीक नहीं है। वह उसे अस्थिर करने की कोशिशों में लगा हुआ है। इसके लिए वह आतंकियों की मदद भी ले रहा है।

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भारत जैसे देश जो वहां निर्माण के कार्यों में लगे हैं उनके खिलाफ भी वह साजिश रच रहा है। हालांकि अफगानिस्तान भारत को अपना पारंपरिक दोस्त समझता है और इसीलिए वह अपने विकास में भारत की बड़ी भूमिका देख रहा है। इसी वजह से भारत लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र और ग्रामीण इलाकों की तरक्की में उसकी मदद कर रहा है। इसके अलावा भारत वहां ट्रांसमिशन लाइन, डैम परियोजना व हाईवे आदि का निर्माण कार्य कर रहा है। वहां के संसद परिसर का निर्माण भी भारत ने ही किया है। आज सौ भारतीय कंपनियां अफगानिस्तान में काम कर रही हैं, इनमें से 43 फीसदी सेवा क्षेत्र और 41 फीसदी निर्माण क्षेत्र में कार्यरत हैं, लेकिन पाकिस्तान भारत की उपस्थिति को लेकर सहज नहीं है। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर कई बार भारतीय दूतावास और निर्माण कार्य में लगे कर्मचारियों पर हमले हो चुके हैं। इस प्रकार अफगानिस्तान में भले ही एक चुनी हुई सरकार काम कर रही है, परंतु वहां आतंकवाद के खतरे अब भी बरकरार हैं।

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