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चिंतन: रेलवे को बदहाली से उबारने की चुनौती

समय के साथ रेलवे में निवेश पर ध्यान नहीं दिए जाने से ट्रेन में भीड़ तो बढ़ी पर उस अनुपात में क्षमता विस्तार नहीं हुआ।

चिंतन: रेलवे को बदहाली से उबारने की चुनौती
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भारतीय रेलवे आर्थिक, ढांचागत और सुरक्षा के मोर्चे पर किस कदर बदहाल है, इसे ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है। रेलवे जहां यात्रियों को बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम साबित हो रहा है, वहीं सुरक्षित यात्रा की गारंटी देने की स्थिति में भी नहीं है। लेटलतीफी तो एक पहचान के रूप में इससे जुड़ गई है। रेलवे के इस हालत के लिए सरकारों की लोकलुभावन नीतियां कहीं ज्यादा जिम्मेदार हैं। इसका राजनीतिक रूप से इस कदर दोहन किया गया है कि यह देश के विकास का इंजन बनने की बजाय बाधक बनने की स्थिति में पहुंच गया। इसको बदहाली से बाहर निकालकर पटरी पर लाने के लिए मोदी सरकार ने संकल्प लिया है। इसकी एक झलक वर्ष 2015-16 के रेल बजट में देखने को मिली है। दूसरी ओर रेलवे के कायाकलट करने के लिए अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में भी एक समिति बनाई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इसने रेलवे के पुनर्गठन के लिए ढेर सारे सुझाव दिए हैं।
समिति ने कहा है कि केंद्र सरकार को अलग से रेल बजट को लाने की परंपरा समाप्त कर देनी चाहिए। रेलवे को उबारना है तो निजी कंपनियों को ट्रेन चलाने की इजाजत दी जानी चाहिए व रेलवे को अपना काम नीतियां बनाने अर्थातनिगरानी करने तक सीमित रखना चाहिए। निजी कंपनियों को वैगन, कोच और लोकोमोटिव निर्माण की इजाजत देने की भी बात कही गई है। साथ ही सभी मौजूदा प्रॉडक्शन यूनिट्स के स्थान पर इंडियन रेलवे मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाने, रेलवे स्टेशनों के प्रबंधन के लिए अलग कंपनी बनाने, रेलवे बोर्ड व रेल मंत्रालय से अलग एक स्वतंत्र नियामक संस्था बनाने की बात भी कही है। इस संस्था का काम किराए की दर, सर्विस कॉस्ट का निर्धारण, ट्रैक प्रबंधन, अन्य कामों के लिए तकनीकी मापदंड तय करना होना चाहिए।
अब इन सिफारिशों को मोदी सरकार कितना मानती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। रेलवे देश की जीवन रेखा है। यह देश में हर वर्ग की यात्रा के लिए सबसे सस्ता, सुलभ माध्यम है। इससे ढाई करोड़ लोग प्रतिदिन यात्रा करते हैं। ऐसे में इसे निजी हाथों में सौंपने का सुझाव कितना महत्वपूर्ण है?
प्रधानमंत्री और रेलमंत्री अलग अलग मंचों से कह चुके हैं कि रेलवे का किसी भी हाल में निजीकरण नहीं किया जाएगा। हालांकि एक बात स्पष्ट है कि आज भारतीय रेलवे की न तो माली हालत ऐसी है कि नई योजनाओं को शुरू किया जाए और न ही उस तरह का ढांचा है जिस पर आगे रेलवे का विस्तार किया जाए। एक तरह से पूरे रेल के सिस्टम को अपग्रेड करने की जरूरत है। तभी यह यात्री सुविधा, सुरक्षा, बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण और वित्तीय आत्मनिर्भरता हासिल कर पाएगा।
हालांकि समय के साथ रेलवे में निवेश पर ध्यान नहीं दिए जाने से ट्रेन में भीड़ तो बढ़ी पर उस अनुपात में क्षमता विस्तार नहीं हुआ। रेलवे की कार्यकुशलता घटी और गति कम हुई। आज रेलवे इस दुश्चक्र में फंस गया है। जिसे तोड़ना काफी जरूरी है। पूंजी निवेश और कार्यकुशलता बढ़ाकर इसे तोड़ा जा सकता है। यह अकेले केंद्र सरकार के बस की बात नहीं है। अब मोदी सरकार इसे कैसे करेगी यह देखना दिलचस्प होगा।
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