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हिंद महासागर को सुरक्षित करेगी सागर कूटनीति

उपेक्षित हिंद महासागरीय देशों के साथ संबंध बढ़ाने की प्रधानमंत्री मोदी की पहल को कूटनीतिक सागरमंथन की संज्ञा दी जा सकती है।

हिंद महासागर को सुरक्षित करेगी सागर कूटनीति
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंद महासागरीय देशों सेशेल्स, मॉरीशस और श्रीलंका की यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर है। उन्होंने जिस कूटनीतिक उद्देश्य से इस पांच दिवसीय दौरे का आगाज किया था वह पूरा होता प्रतीत हो रहा है। ये देश भारत के कूटनीतिक परिदृश्य से बहुत वर्षों से एक तरह से गायब थे। जिससे इस क्षेत्र में भारत का रक्षा कवच कमजोर हो गया था।

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जाहिर है इन उपेक्षित हिंद महासागरीय देशों के साथ संबंध बढ़ाने की प्रधानमंत्री मोदी की पहल को कूटनीतिक सागरमंथन की संज्ञा दी जा सकती है। पिछले 34 वर्षों में वह सेशेल्स जाने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं और 28 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री र्शीलंका गया है। इसी तरह नौ वर्ष के अंतराल के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली मॉरीशस यात्रा थी। हिंद महासागर भारत के सामरिक हितों की रक्षा का सबसे बड़ा क्षेत्र बना है। जाहिए है, भारत के सामने हिंद महासागरीय देशों में अपनी पहुंच बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि हमारी संपूर्ण आर्थिक प्राणरेखा हिंद महासागर से गुजरती है।

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ऐसे में भारत के लिए सेशेल्स, मॉरीशस और श्रीलंका जैसे देश छोटे होते हुए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। सेशेल्स हिंद महासागर का एक छोटा, लेकिन सामरिक महत्व का द्वीप है। 115 छोटे छोटे द्वीपों से बने सेशेल्स की मौजूदा आबादी 93 हजार है और वहां भारतीय मूल के दस हजार नागरिक रहते हैं। यहां चीन लगातार अपनी दखल बढ़ाता जा रहा है। भारत ने अब तक सेशेल्स को सागर तटीय निगरानी राडार सिस्टम, एक डोरनियर विमान और दो पुराने चेतक हेलीकॉप्टर देने के अलावा वहां के सैनिकों को प्रशिक्षण भी दिया है।

वहीं प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच हाइड्रोग्राफी, नवीकरणीय ऊर्जा, बुनियादी ढांचा विकास और नौवहन चार्ट व इलेक्ट्रॉनिक नौवहन जैसे महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। मॉरीशस को तो ‘लघु भारत’ कहा जाता है। यहां की आधी से ज्यादा आबादी भारतीयों की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में गैर सार्क देशों से आमंत्रित एक मात्र राष्ट्राध्यक्ष मॉरीशस के प्रधानमंत्री ही थे। आज भारत मॉरीशस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और मॉरीशस इस क्षेत्र में भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र देश है।

प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद दोनों देश और करीब आए हैं। दरअसल, भारत और मॉरीशस दोहरे कराधान की बचाव संधि (डीटीएटी) पर बातचीत को राजी हो गए हैं। भारत लंबे समय से इसमें बदलाव की मांग कर रहा था। इसकी मदद से लोग न सिर्फ कर चोरी कर रहे हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर देश में कालाधन आ रहा है।

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प्रधानमंत्री अपनी यात्रा के अंत में शुक्रवार को र्शीलंका पहुंचे, जहां नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना से उनकी शिखर वार्ता हुई। उम्मीद है कि इससे दोनों देश न सिर्फसामरिक, रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तौर पर और नजदीक आएंगे, बल्कि दोनों के बीच जो अविश्वास की खाई पैदा हो गई है, उसे भी पाटने में मदद मिलेगी। महिंदा राजपक्षे के समय चीन की र्शीलंका में उपस्थिति खतरनाक स्तर तक बढ़ गई थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यह सागरमंथन यात्रा भारत के सामरिक हितों की रक्षा, हिंद महासागर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी देशों की अवांछनीय दखल और भारत विरोधी कदम को रोकने की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित होगा। इससे भारत ही नहीं, हिंद महासागर क्षेत्र के अन्य देशों को भी सामरिक रक्षा कवच और आर्थिक लाभ प्राप्त होगा।

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