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अज्ञानता से लड़ने का संकल्प लेने का पर्व

दिवाली अपने अंदर और बाहर बुराई के रूप में व्याप्त अंधेरे को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर करने का भी पर्व है।

अज्ञानता से लड़ने का संकल्प लेने का पर्व
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नई दिल्ली. जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना, अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए..। जानेमाने कवि गोपालदास नीरज की कविता की ये पंक्ति प्रकाश पर्व अर्थात दीपोत्सव के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध दिवाली का उद्देश्य बता रही है। दीपावली की शुरुआत क्यों और कब हुई थी इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं हैं। माना जाता है कि इसी दिन अयोध्या के राजा रामचंद्र चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात घर लौटे थे। और लोगों ने घी के दिये जलाकर उनका स्वागत किया था। तर्कशास्त्री इसके औचित्य को ऋतु परिवर्तन से जोड़कर देखते हैं। उनके अनुसार वर्षाऋतु में चारों तरफ गंदगी फैल जाती है। तरह तरह के कीट पतंगों की भरमार हो जाती है। लिहाजा शीतकाल के पूर्व इस त्योहार के जरिए घर-द्वार की सफाई हो जाती है और घी के दिए जलाने से वातावरण शुद्ध होता है।

दरअसल, दिवाली अपने अंदर और बाहर बुराई के रूप में व्याप्त अंधेरे को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर करने का भी पर्व है। उपनिषद के अनुसार तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात अंधेरे से प्रकाश की ओर जाइए। इसे दीपावली ही चरितार्थ करती है। यह याद दिलाती है कि सत्य की सदा जीत होती है और झूठ की हार। इसके साथ ही दीपावली संकल्प लेने का भी त्योहार है। अर्थात अपने अंदर और समाज में फैली बुराइयों पर विजय पाने का संकल्प। भारत पर्व-त्योहारों का देश माना जाता है। ये त्योहार हमारी सांस्कृतिक विविधता का अहसास कराते ही हैं, साथ ही इनके सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक पहलू भी होते हैं जो समाज को आपसी मेलजोल बढ़ाने और खुशी बांटने के मौके प्रदान करते हैं।

ये समाज को एकजुट होने और भाईचारा बढ़ाने का संदेश देते हैं और लोक कल्याण के रास्ते दिखाते हैं। कई धर्मों व देशों में दीपावली अलग-अलग नामों व रूपों में मनाई जाती है परंतु क्या आज जो दिवाली हमारे सामने है, इसका जो स्वरूप हम देख रहे हैं, वह सच में इन पहलुओं को उजागर कर रही है और मनाए जाने के पीछे निहित उद्देश्यों पर खरी उतर रही है? ध्यान से देखें तो हमें निराशा ही मिलती है, यह त्योहार अपने मूल उद्देश्यों से भटकता प्रतीत हो रहा है। आज इस पर आर्थिक पहलू ज्यादा हावी हो गए हैं। सामाजिक और धार्मिक सरोकार कहीं पीछे छूटने लगे हैं। जो उचित नहीं है। बाजार ने त्योहार को महंगे उपभोक्ता सामानों की खरीद और महंगे उपहारों के लेन-देन तक में सीमित करने का काम करने लगा है।

ऐसे में भावनाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। गैर-जरूरी उपभोग, फिजूलखर्ची और दिखावा हावी हो जाता है। दिवाली भी व्यक्तिगत उपभोग, लालच और तड़क-भड़क का वाहक बनती प्रतीत हो रही है। आज जिस तरह से आतिशबाजी का चलन बढ़ा है उसके फायदे कम नुकसान ज्यादा हो रहे हैं। त्योहारों को जितनी सादगी से मनाया जाए उनका आनंद उतना ही बढ़ता है। आज समाज में जिस तरह की बुराइयां बढ़ रही हैं, उससे लग रहा है कि देश-समाज ने दीपावली के संदेशों को अमल में नहीं लाया है।

दीपावली को केवल रस्म अदायगी तक सीमित न करें। इसके संदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प लें। तभी हम स्वयं एक दीपक की भांति प्रकाशमान हो सकेंगे और फिर अंधेरे रूपी तमाम बुराइयों का अंत हो सकेगा।

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